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दत्तोपंत ठेंगड़ी ने श्रमिक आंदोलन को दिया राष्ट्रहित और स्वदेशी चिंतन का आधार

जमशेदपुर। भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भारतीय श्रमिक आंदोलन को एक नई वैचारिक दिशा देते हुए श्रमिकों के अधिकारों, उद्योगों की प्रगति और राष्ट्रहित के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। वे मानते थे कि मजदूर केवल उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की आर्थिक उन्नति और सामाजिक विकास के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। श्रम की गरिमा, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान उनके चिंतन के प्रमुख आधार थे। 14 अक्टूबर 2004 को उनके निधन के बाद भी उनके विचार श्रमिक संगठनों और सामाजिक जीवन में प्रासंगिक बने हुए हैं। उनकी पुण्यतिथि पर देश उनके योगदान और वैचारिक विरासत का स्मरण कर रहा है।

दत्तोपंत ठेंगड़ी का जन्म 10 नवंबर 1920 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के आर्वी में हुआ था। बचपन से ही उनमें देशभक्ति और समाजसेवा की भावना थी। वर्ष 1935 में उन्होंने आर्वी तालुका की वानर सेना के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के संपर्क में आने के बाद उनके वैचारिक जीवन को नई दिशा मिली। उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने एमए और कानून की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1941 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने और संगठनात्मक कार्यों के लिए केरल भेजे गए। इसके बाद उन्होंने बंगाल और असम में भी संगठन का दायित्व निभाया। विभिन्न क्षेत्रों में काम करने के अनुभव ने उन्हें भारतीय समाज की विविधताओं और उसकी समस्याओं को समझने का अवसर दिया।

उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान श्रमिक आंदोलन के क्षेत्र में रहा। तत्कालीन श्रमिक संगठनों की कार्यप्रणाली और मजदूरों की समस्याओं का अध्ययन करने के बाद उन्होंने एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की, जो श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के साथ राष्ट्रीय हितों को भी महत्व दे। इसी सोच के तहत 23 जुलाई 1955 को भारतीय मजदूर संघ की स्थापना हुई। दत्तोपंत ठेंगड़ी ने श्रमिकों के हितों को केवल वेतन वृद्धि और सुविधाओं की मांग तक सीमित रखने के बजाय उन्हें राष्ट्र के आर्थिक विकास से जोड़ने पर जोर दिया।

उनका प्रसिद्ध नारा ‘देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम’ श्रम के उचित मूल्य और राष्ट्रीय दायित्व के प्रति उनकी सोच को स्पष्ट करता है। वे श्रमिकों और उद्योग प्रबंधन के बीच टकराव के बजाय संवाद, सहयोग और आपसी समझ के पक्षधर थे। उनका मानना था कि उद्योगों की प्रगति और श्रमिकों का कल्याण एक-दूसरे के पूरक हैं। मजबूत औद्योगिक व्यवस्था के लिए श्रमिकों को सम्मान, उचित पारिश्रमिक और सुरक्षित कार्य परिस्थितियां मिलना आवश्यक है।

दत्तोपंत ठेंगड़ी की वैचारिक भूमिका श्रमिक आंदोलन से आगे भी विस्तृत रही। भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठनों के गठन एवं विकास में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रारंभिक विकास में भी उनकी भूमिका रही। उनके प्रयासों का उद्देश्य श्रमिकों, किसानों, विद्यार्थियों और समाज के विभिन्न वर्गों को राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया से जोड़ना था। वे स्वदेशी को केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, स्थानीय उत्पादन, रोजगार के अवसरों और राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़ा व्यापक विचार मानते थे।

उनका आर्थिक चिंतन पूंजीवाद और साम्यवाद की सीमाओं के विश्लेषण पर भी आधारित था। वे ऐसी व्यवस्था के समर्थक थे, जिसमें व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के हितों के बीच संतुलन बना रहे। उनका विश्वास था कि भारत की आर्थिक नीतियों और विकास मॉडल का निर्धारण देश की परिस्थितियों, आवश्यकताओं और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसी दृष्टिकोण को उन्होंने अपनी लेखनी और संगठनात्मक गतिविधियों के माध्यम से व्यापक स्तर पर सामने रखा।

25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू होने के बाद दत्तोपंत ठेंगड़ी लोकतंत्र की रक्षा के लिए सक्रिय हुए। उन्होंने लोक संघर्ष समिति के माध्यम से आपातकाल विरोधी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष भी सामने आया, जिसमें वे संगठनात्मक प्रतिबद्धता के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं। वे वर्ष 1951 से 1953 के बीच मध्य प्रदेश में भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री रहे। इसके अलावा वर्ष 1964 से 1976 के बीच दो कार्यकालों में राज्यसभा के सदस्य भी रहे। हालांकि, उनकी प्राथमिकता श्रमिकों और सामाजिक संगठनों के बीच काम करना रही।

दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी सादगी, वैचारिक दृढ़ता और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता के लिए भी पहचाने जाते थे। वर्ष 2002 में उन्होंने पद्मभूषण सम्मान स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। उनका यह निर्णय उनकी व्यक्तिगत मान्यताओं और वैचारिक आग्रह से जुड़ा माना गया। वे संगठन, विचार और राष्ट्रसेवा को व्यक्तिगत सम्मान से अधिक महत्व देते थे।

वे एक गंभीर लेखक और चिंतक भी थे। हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में लिखी गई उनकी पुस्तकों में भारतीय अर्थव्यवस्था, श्रमिक अधिकार, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और राष्ट्रजीवन से जुड़े विषयों पर विस्तार से विचार किया गया है। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘एकात्म मानव दर्शन’, ‘ध्येय-पथ’, ‘हमारा अधिष्ठान’, ‘कम्युनिज्म अपनी ही कसौटी पर’, ‘थर्ड वे’ और ‘राष्ट्रीय श्रम दिवस’ उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप आर्थिक और सामाजिक चिंतन को विकसित करने पर बल दिया।

दत्तोपंत ठेंगड़ी का जीवन इस विचार को रेखांकित करता है कि श्रमिक आंदोलन की सफलता केवल अधिकारों की मांग करने में नहीं, बल्कि श्रम के सम्मान, संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी को मजबूत करने में भी निहित है। 14 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि उनके योगदान को याद करने के साथ-साथ श्रमिक कल्याण, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रहित के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को समझने का अवसर है।

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