जमशेदपुर। रामलीला के द्वितीय दिवस सोमवार को मंच पर रावण, कुंभकरण और विभीषण की कठोर तपस्या, ब्रह्मा से वरदान प्राप्त करने, रावण के अत्याचार और भगवान श्रीराम के जन्म तक की कथा का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से रामायण के महत्वपूर्ण प्रसंगों को जीवंत कर दर्शकों को धर्म, भक्ति और मर्यादा का संदेश दिया।
रामलीला की शुरुआत रावण, कुंभकरण और विभीषण की कठोर तपस्या के प्रसंग से हुई। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया। वरदान प्राप्त करने के बाद रावण के अहंकार और अत्याचार में वृद्धि होने लगी। उसने अपने भाई कुबेर को बंदी बनाकर लंका पर अधिकार कर लिया और अपनी शक्ति के बल पर तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगा। रावण के बढ़ते अत्याचार और उसके अहंकार को कलाकारों ने प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
इसके बाद कथा अयोध्या की ओर मुड़ी, जहां राजा दशरथ संतान प्राप्ति नहीं होने के कारण चिंतित और उदास रहते हैं। संतान की कामना पूरी करने के लिए ऋषि विश्वामित्र के मार्गदर्शन में श्रृंगी ऋषि द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ कराया गया। यज्ञ के फलस्वरूप राजा दशरथ के यहां चार पुत्रों का जन्म हुआ। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के जन्म के प्रसंग का मंचन भक्तिमय वातावरण में किया गया। भगवान श्रीराम के जन्म के साथ ही रामलीला स्थल जय श्रीराम के जयघोष से गूंज उठा।
रामलीला के कलाकारों ने संवाद, अभिनय और मंचीय प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों को कथा से जोड़कर रखा। धार्मिक प्रसंगों के मंचन ने श्रद्धालुओं में उत्साह और भक्ति का संचार किया। रामलीला के दूसरे दिन रावण के अहंकार और अत्याचार से लेकर भगवान श्रीराम के अवतरण तक की कथा ने दर्शकों को धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का संदेश दिया।

