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Wed. Sep 9th, 2026

भारत ने विद्युत चुंबकीय युद्ध की दिशा में बढ़ाया कदम, DRDO का ‘शील्ड’ कार्यक्रम भविष्य के युद्धक्षेत्र की तैयारी

नई दिल्ली। भारत ने भविष्य के युद्धक्षेत्र में अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) का ‘शील्ड’ कार्यक्रम उच्च शक्ति वाले माइक्रोवेव विकिरण और विद्युत चुंबकीय प्रभावों के बीच इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की क्षमता का आकलन करने पर केंद्रित है। इस तरह की तकनीक भविष्य में ड्रोन, संचार प्रणालियों, सेंसर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली निर्देशित ऊर्जा तथा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

कार्यक्रम के तहत एस-बैंड माइक्रोवेव मूल्यांकन प्रणाली जैसी तकनीक का इस्तेमाल उच्च-शक्ति माइक्रोवेव वातावरण में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रदर्शन का परीक्षण करने के लिए किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परीक्षण व्यवस्था 3 किलोवोल्ट प्रति मीटर से अधिक दूर-क्षेत्र विद्युत क्षेत्र की तीव्रता पैदा करने में सक्षम है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि तेज विद्युत चुंबकीय विकिरण के संपर्क में आने पर सैन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियां किस तरह प्रतिक्रिया करती हैं और उनकी सुरक्षा को किस स्तर तक मजबूत किया जा सकता है।

आधुनिक युद्ध में इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ड्रोन, रडार, उपग्रह संचार, नेविगेशन सिस्टम और विभिन्न प्रकार के सेंसर सैन्य अभियानों का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में किसी विरोधी की इलेक्ट्रॉनिक क्षमता को बाधित करना और अपनी प्रणालियों को ऐसे हमलों से सुरक्षित रखना युद्धक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

उच्च-शक्ति माइक्रोवेव तकनीक निर्देशित ऊर्जा हथियारों की व्यापक श्रेणी का हिस्सा है। पारंपरिक हथियारों के विपरीत, ऐसी प्रणालियां ऊर्जा के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं। विशेष रूप से ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए ऐसी तकनीकों में रुचि बढ़ी है। भविष्य में इनका इस्तेमाल एक साथ कई छोटे ड्रोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक लक्ष्यों के खिलाफ रक्षा व्यवस्था विकसित करने में किया जा सकता है, हालांकि किसी वास्तविक सैन्य प्रणाली की परिचालन क्षमता उसके परीक्षण परिणामों, ऊर्जा स्रोत, लक्ष्य पहचान और प्रभावी दूरी सहित कई कारकों पर निर्भर करेगी।

‘शील्ड’ जैसे परीक्षण कार्यक्रमों का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की मजबूती बढ़ाना है। युद्ध के दौरान दुश्मन द्वारा शक्तिशाली विद्युत चुंबकीय विकिरण का इस्तेमाल किए जाने की स्थिति में संचार, रडार और अन्य उपकरणों को काम करते रहने के लिए अधिक मजबूत डिजाइन की आवश्यकता होती है। इस दृष्टि से ऐसे परीक्षण भारत की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और विद्युत चुंबकीय संगतता संबंधी अनुसंधान क्षमता को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में युद्ध केवल जमीन, समुद्र और हवा में सैन्य प्लेटफॉर्म के बीच मुकाबले तक सीमित नहीं रहेगा। स्पेक्ट्रम नियंत्रण, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, साइबर क्षमता और निर्देशित ऊर्जा तकनीक भी सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बनेंगी। भारत द्वारा इन क्षेत्रों में अनुसंधान और परीक्षण पर जोर दिए जाने से स्वदेशी रक्षा तकनीक को बढ़ावा मिलने की संभावना है।

हालांकि, एस-बैंड माइक्रोवेव परीक्षण प्रणाली या 3 kV/m से अधिक विद्युत क्षेत्र की क्षमता को अपने आप में किसी पूर्ण विकसित परिचालन निर्देशित ऊर्जा हथियार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह मुख्य रूप से ऐसी तकनीकों और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के परीक्षण एवं मूल्यांकन से जुड़ी क्षमता को दर्शाता है। वास्तविक युद्धक प्रणाली की क्षमता के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए उसके आधिकारिक परीक्षण परिणाम और DRDO की विस्तृत तकनीकी जानकारी आवश्यक होगी।

भारत की रक्षा तकनीक अब पारंपरिक गतिज हथियारों के साथ-साथ विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम में बढ़त हासिल करने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। ड्रोन के बढ़ते खतरे और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की बदलती प्रकृति के बीच ‘शील्ड’ जैसे कार्यक्रम भविष्य के ऐसे युद्धक्षेत्र के लिए तकनीकी आधार तैयार कर सकते हैं, जहां किसी विरोधी को केवल मिसाइल या गोली से नहीं, बल्कि उसके इलेक्ट्रॉनिक तंत्र को बाधित करके भी कमजोर किया जा सके।

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