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साहित्य में विचारधारा की भूमिका गौण नहीं, महत्वपूर्ण है : भीष्म साहनी जन्मदिवस पर विशेष : प्रतिबद्धता, मानवीय सरोकार और रचनात्मक स्वतंत्रता के साहित्यकार

जमशेदपुर।हिंदी साहित्य में भीष्म साहनी का नाम उस पीढ़ी के महत्वपूर्ण रचनाकारों में लिया जाता है, जिसने साहित्य को समाज और मनुष्य के संघर्षों से जोड़कर देखा। वे केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि उपन्यासकार, नाटककार, अनुवादक, संपादक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी थे। उनकी रचनाओं में अपने समय का सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक अंतर्विरोध, सांप्रदायिकता, विभाजन की त्रासदी, स्त्री की स्थिति और आम आदमी का संघर्ष बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने आता है।भीष्म साहनी को याद करना हिंदी साहित्य की उस प्रगतिशील और मानवीय परंपरा को याद करना है, जिसमें साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को समझने और उसकी विसंगतियों पर सवाल उठाने का माध्यम भी है।

उनका रचना-संसार अत्यंत व्यापक था। ‘तमस’, ‘झरोखे’, ‘कड़ियां’, ‘बसंती’, ‘कुंतो’, ‘मय्यादास की माड़ी’ और ‘नीलू, नीलिमा, नीलोफर’ जैसे उपन्यासों ने हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध किया। कहानी के क्षेत्र में ‘भाग्यरेखा’, ‘पहला पाठ’, ‘पाली’, ‘निशाचर’, ‘डायन’, ‘शोभायात्रा’ और ‘अमृतसर आ गया है’ जैसी रचनाएं उल्लेखनीय हैं। वहीं ‘कबीरा खड़ा बाजार में’, ‘हानूश’, ‘माधवी’ और ‘मुआवजे’ जैसे नाटकों ने उनके नाट्य लेखन की विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ उनके जीवन और साहित्यिक विचारों को समझने का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।भीष्म साहनी का साहित्य विचारधारा से गहरे जुड़ा था। वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े और संगठनात्मक स्तर पर भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। 1975 में गया सम्मेलन में वे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव बने और 1986 तक इस दायित्व पर रहे। वे भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे।

हालांकि उनकी विचारधारा किसी संकीर्ण राजनीतिक आग्रह में सीमित नहीं थी। उनके लिए विचारधारा मनुष्य और समाज को देखने की दृष्टि थी। अपनी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ में उन्होंने विचारधारा और साहित्य के रिश्ते को स्पष्ट करते हुए कहा था कि यदि विचारधारा मानव मूल्यों से जुड़ती है, तो वह लेखक की स्वतंत्रता को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे दृष्टि और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करती है।साहित्य में विचारधारा को लेकर बहस होती है कि लेखक को किसी विचारधारा से बंधना चाहिए या नहीं। भीष्म साहनी का जीवन इस प्रश्न का संतुलित उत्तर देता है। उनका मानना था कि प्रतिबद्धता रचनात्मक स्वतंत्रता की दुश्मन नहीं, बल्कि सही मानवीय मूल्यों से जुड़कर उसकी शक्ति बन सकती है।

भीष्म साहनी की युवावस्था देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के दौर में बीती। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने उनके राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया। इस दौर में उन्होंने समाज और राजनीति को करीब से देखा तथा अनेक महत्वपूर्ण साहित्यिक और राजनीतिक व्यक्तित्वों के संपर्क में आए।इन अनुभवों ने उनके साहित्य को गहराई दी। उनके पात्र काल्पनिक दुनिया के निष्क्रिय लोग नहीं हैं, बल्कि अपने समय की परिस्थितियों से जूझते हुए जीवित मनुष्य हैं। उनके भीतर भय भी है, संघर्ष भी और बेहतर भविष्य की उम्मीद भी।

‘तमस’ : विभाजन की त्रासदी का दस्तावेज

भीष्म साहनी की सबसे चर्चित कृति ‘तमस’ है। भारत के विभाजन पर लिखे गए हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यासों में इसका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभाजन की त्रासदी को उन्होंने स्वयं करीब से देखा था। इसलिए ‘तमस’ में सांप्रदायिक हिंसा, विस्थापन, भय और अविश्वास का चित्रण अत्यंत प्रामाणिक दिखाई देता है।‘तमस’ किसी एक समुदाय को दोषी ठहराने वाली रचना नहीं है। यह बताता है कि सांप्रदायिक राजनीति किस प्रकार आम आदमी को हिंसा की आग में झोंक देती है। धर्म और राजनीति के गठजोड़ से पैदा होने वाला उन्माद अंततः उन्हीं लोगों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाता है, जो इस संघर्ष के लिए जिम्मेदार नहीं होते।‘पाली’, ‘आवाजें’, ‘निमित्त’ और ‘अमृतसर आ गया है’ जैसी उनकी कहानियों में भी विभाजन का दर्द दिखाई देता है। उनके यहां इतिहास केवल घटनाओं का सिलसिला नहीं, बल्कि मनुष्य की पीड़ा और स्मृति का दस्तावेज है। ‘तमस’ पर बाद में गोविंद निहलानी ने इसी नाम से टेलीविजन धारावाहिक बनाया, जिसने इस रचना को देश के व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया।

इतिहास और समाज को देखने की नई दृष्टि

‘मय्यादास की माड़ी’ में भीष्म साहनी ने इतिहास, सत्ता और समाज के संबंधों को रेखांकित किया। वे इतिहास को केवल राजाओं और युद्धों की कथा नहीं मानते थे। उनके साहित्य में आम आदमी भी इतिहास का महत्वपूर्ण पात्र है।उनके उपन्यासों और कहानियों में सत्ता के बड़े फैसलों का प्रभाव समाज के सामान्य लोगों पर किस प्रकार पड़ता है, यह लगातार दिखाई देता है। यही वजह है कि उनका साहित्य इतिहास को मानवीय दृष्टि से देखने का अवसर देता है।नाटक भीष्म साहनी की रचनात्मकता का महत्वपूर्ण क्षेत्र था। ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ में कबीर के माध्यम से धार्मिक पाखंड और सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाए गए हैं। ‘माधवी’ में स्त्री की स्थिति और पुरुषप्रधान व्यवस्था की विसंगतियों को सामने लाया गया है। ‘हानूश’ और ‘मुआवजे’ में भी सत्ता, समाज और व्यक्ति के संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं।भीष्म साहनी मानते थे कि नाटक की पहुंच साहित्य से कहीं व्यापक हो सकती है। मंच पर कही गई बात सीधे दर्शकों तक पहुंचती है और उनके भीतर लंबे समय तक बनी रह सकती है। इसलिए उनका रंगमंच मनोरंजन के साथ सामाजिक चेतना का भी माध्यम बना।

1957 से 1963 तक मास्को में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह से जुड़े रहते हुए उन्होंने अनेक रूसी साहित्यिक कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया। टॉल्सटॉय सहित कई महत्वपूर्ण लेखकों को हिंदी पाठकों तक पहुंचाने में उनकी भूमिका रही।
वे अनुवाद को केवल शब्दों का स्थानांतरण नहीं मानते थे। उनका मानना था कि सफल अनुवाद वही है जिसमें मूल रचना की संवेदना और साहित्यिक रस दूसरी भाषा में भी जीवित रहे। यह दृष्टि उनकी भाषाई समझ और साहित्यिक परिपक्वता को दर्शाती है।

लेखक राजनीति से आगे चलने वाली मशाल

भीष्म साहनी का विश्वास था कि लेखक का काम अपने समय के यथार्थ को समझना, उसके अंतर्विरोधों को पहचानना और समाज में चल रहे संघर्षों को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करना है। इसी कारण वे मानते थे कि लेखक कई बार राजनीति से आगे चलने वाली मशाल बन सकता है।
इसका अर्थ राजनीतिक प्रचार नहीं, बल्कि समाज की गहरी सच्चाइयों को पहचानना है। भीष्म साहनी की रचनाएं इसका प्रमाण हैं। उन्होंने विचारधारा को मनुष्य पर आरोपित नहीं किया, बल्कि मनुष्य की गरिमा, समानता, न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द के सवालों से जोड़ा।

आज जब समाज में धर्म, राजनीति, पहचान और विचारधारा को लेकर बहसें तीखी हैं, भीष्म साहनी का साहित्य पहले से अधिक प्रासंगिक लगता है। उनका साहित्य बताता है कि विचारधारा तभी सार्थक है जब वह मनुष्यता के पक्ष में खड़ी हो।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने पाठक पर विचार थोपे नहीं, बल्कि उसे परिस्थितियों के सामने खड़ा किया। पाठक स्वयं सवाल करे, स्वयं सोचे और स्वयं निष्कर्ष तक पहुंचे—यही उनकी रचनात्मक शक्ति थी।भीष्म साहनी का साहित्य हमें सिखाता है कि लेखक अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहकर भी रचना की स्वतंत्रता बनाए रख सकता है। इतिहास को समझते हुए वर्तमान पर सवाल उठाए जा सकते हैं और राजनीति के बीच भी मनुष्य को केंद्र में रखा जा सकता है।

वरुण कुमार, लेखक एवं कवि के सौजन्य से

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