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बंदे मातरम् गीत के 150 वर्ष : राष्ट्रभक्ति की अमर गूँज

लेखक – सुरेश सोंथालिया संयुक्त राष्ट्रीय महामंत्री

कैट

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा को यदि किसी गीत ने शब्द दिए, तो वह गीत है — “बंदे मातरम्”। यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि एक भावना, एक शक्ति , जोश और एक पुकार है जिसने पराधीन भारत में स्वतंत्रता की चिंगारी प्रज्वलित की। वर्ष 2025 में इस गीत की रचना को 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर हम उस गीत को नमन करते हैं, जिसने हर भारतीय के हृदय में मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण की भावना भरी।

गीत की उत्पत्ति और रचनाकार :

“बंदे मातरम्” की रचना महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में की थी। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा है, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। इस रचना का केंद्र भारतमाता का रूप है — हरे-भरे खेतों, नदियों, पर्वतों,देवी दुर्गा और समृद्ध संस्कृति से सुसज्जित मातृभूमि की दिव्य छवि।

संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण में रचित यह गीत न केवल साहित्यिक दृष्टि से श्रेष्ठ है, बल्कि इसकी प्रत्येक पंक्ति भारतीय आत्मा का प्रतिरूप बन गई।

स्वतंत्रता संग्राम में गीत की भूमिका :

स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में “बंदे मातरम्” एक घोषवाक्य बन गया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब सड़कों पर यह गीत गूंजा, तो जनता में अद्भुत एकता और साहस का संचार हुआ।

लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, अरविंद घोष और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्र की आवाज़ बना दिया। ब्रिटिश शासन इस गीत से इतना भयभीत था कि उसने इसे सार्वजनिक रूप से गाने पर कई बार प्रतिबंध लगाया, परंतु यह स्वर कभी थमा नहीं — यह भारत की धड़कन बन गया।

स्वतंत्र भारत में ‘बंदे मातरम्’ का स्थान :

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब राष्ट्रगान और राष्ट्रीय प्रतीकों पर विचार हुआ, तब “बंदे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्रदान किया गया।

“जन गण मन” को राष्ट्रगान के रूप में चुना गया, पर “बंदे मातरम्” को समान रूप से सम्मानित स्थान दिया गया। आज भी यह गीत भारतीय संसद में, विद्यालयों में और राष्ट्रीय पर्वों पर गर्व के साथ गाया जाता है।

आज के भारत में इसकी प्रासंगिकता :

150 वर्षों के इस लंबे अंतराल के बाद भी “बंदे मातरम्” का भाव आज भी उतना ही जीवंत है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रप्रेम केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की जिम्मेदारी भी है।

आज जब हम आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा में अग्रसर हैं, तब इस गीत की पंक्तियाँ हमें प्रेरित करती हैं —

“सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्, शुभ्रज्योत्स्ना पुलकित यामिनिम्…”

यह भारत की उस सुंदरता और समृद्धि का प्रतीक है, जिसे हमें संजोकर रखना है।

निष्कर्ष :

“बंदे मातरम्” के 150 वर्ष केवल एक साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना के पुनर्जागरण का उत्सव हैं।

यह गीत हमें स्मरण कराता है कि मातृभूमि की सेवा ही सच्चा धर्म है, और उसका सम्मान ही हमारी सबसे बड़ी साधना।

आज भी जब यह गीत गूंजता है, तो हर भारतीय का हृदय एक ही स्वर में कह उठता है —

“वंदे मातरम्! वंदे मातरम्!”

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