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आन्ध्र प्रदेश के दो किसान भाई सब्जी के साथ स्ट्रॉबेरी की खेती और पौधा विकसित करके नेतरहाट को नई पहचान दे रहे है

*आन्ध्र प्रदेश के दो किसान भाई सब्जी के साथ स्ट्रॉबेरी की खेती और पौधा विकसित करके नेतरहाट को नई पहचान दे रहे है*

 

मोहम्मद शहजाद आलम महुआडांड

 

प्रकृति सौंदर्य को बिखेरता नेतरहाट अपनी खुबसूरती के लिए झारखंड ही नही देश भर में मशहूर है. नेतरहाट जो समुद्र तल से 3700 फीट उंचाई में लातेहार जिला में स्थित है, गर्मी के मौसम में अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नही जाता. जंगल-पहाड़, खुशनुमा मौसम झरने, सूर्योदय, सूर्यास्त, नाशपाती बगान और विद्यालय के लिए नेतरहाट जाना जाता है, लेकिन दक्षिण भारत से आये दो सगे भाई आज नेतरहाट में आधुनिक विधी से विभिन्न प्रकार की सब्जी के साथ स्ट्रॉबेरी फल की खेती कर रहे है, इतना ही नही नेतरहाट में स्ट्रॉबेरी के पौधे को विकसित किया जा रहा है, स्ट्रॉबेरी की खेती और नर्सरी से नेतरहाट को एक नई पहचान मिल रही है।

*कौन है आन्ध्र प्रदेश से आये किसान*

 

बॉक्साइट माइनिंग का काम करने राज्य आन्ध्र प्रदेश के जिला इस्ट गोदावरी से 2011 मे नेतरहाट आये दो भाई. राम राजू और श्रीनिवासन राजू चार साल तक डूमरपाठ में बॉक्साइट माइनिंग का काम किया. इसमे घाटा हुआ. तो ये लौटकर आन्ध्र प्रदेश नही गये. बल्की कुछ स्थानीय किसानो की लीज पर 2015 में 25 एकड़ जमीन लेकर नेतरहाट में अधुनिक विधि से खेती की सुरूआत किया. स्थानीय किसानो को आधुनिक खेती से रूबरू कराया. पानी की कमी दूर करने के लिए टपक सिंचाई विधि को अपनाया. शिमला मिर्च, अदरक, हल्दी, कद्दू, आलू और टमाटर की मुख्य रूप से खेती करते है. साथ ही स्थानीय मजदूरो को काम भी मिला. खेती को रोजगार बना चुके राजू ब्रदर्स ने वर्ष 2018 में नेतरहाट में स्ट्राबेरी खेती कि सुरूआत कि. अब इनके द्वारा नेतरहाट में स्ट्रोबेरी नर्सरी की शुरुआत भी कि गई है, स्ट्राबेरी पौधे से पौधा तैयार कर झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ राज्य में बिक्री कर रहे है।

 

*अमूमन महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश से स्ट्रॉबेरी पौधा लाया जाता है*

 

स्ट्रॉबेरी के पौधे महाराष्ट्र के पुणे और हिमाचल प्रदेश के नर्सरी से मंगाए जाते हैं. वहां नर्सरियों में बड़े पैमाने पर इसका पौधा तैयार किया जाता हैं. श्रीनिवासन राजू ने बताया कि नेतरहाट के वातावरण मे विशेषज्ञ सलाह से स्ट्रॉबेरी पौधा से पौधा तैयार किया जा रहा है. नेतरहाट की भूमि और जलवायु स्ट्रॉबेरी के पौधा तैयार करने के लिए अनुकूल है।

 

*महगां खेती स्ट्रॉबेरी कि*

 

एक एकड़ भूमि मे 22 हजार पौधे लगते है. जिस पर लगभग खर्च (मजदूर लेकर) कुल ढाई लाख आता है. 45 दिनो मे फल तैयार हो जाता है. झारखंड मे स्ट्राबेरी की खेती के लिए सितंबर -अक्टूबर का महिना अनुकूल है, फसल समय (नवम्बर) आया तो आठ से दस लाख रूपय देकर जाएगा. सुरूआत में स्ट्राबेरी का फल पांच सौ रूपये किलो बिकता है. फरवरी-मार्च मे हर जगह से स्ट्राबेरी बाजारों मे आने लगते है. तब कीमत मे गिरावट आती है, फिर भी 200 रूपए किलो से कम नही रहता. झारखंड में रांची ,जमशेदपुर छत्तीसगढ में रायपुर बिहार के पटना मे इसका बाजार है. बड़ा बाजार कलकत्ता मे है. मार्च के बाद स्ट्राबेरी की खेती बन्द हो जाती है।

 

*स्ट्रॉबेरी पौधा का ऑर्डर लिया जा रहा है*

 

किसान श्रीनिवासन राजू कहते है, कि आया था बिजनेस करने पर झारखंड ने फिर से किसान बना दिया, किसान परिवार से आते है, देखा यहां लोग पारम्परिक रूप खेती करते है, ख्याल आया कि क्यो न किसानी की जाए, यहां के कृषक को भी अधुनिक खेती से अवगत कराया जाए, कुछ स्थानीय कृषक से बात हुई, जमीन लीज पर मिला, कृषको के साथ मिलकर वर्ष 2015 से सब्जी खेती से सुरूआत किया, फिर नेतरहाट के मौसम को देखते हुए, पहली बार 2018 में हिमाचल प्रदेश से स्ट्रॉबेरी के पौधा लाकर दो एकड़ में खेती किया, मरचिंग व टपक सिंचाई विधि से स्ट्रॉबेरी खेती किया, लेकिन पौधे में क्वालिटी नही मिलने से स्ट्रॉबेरी फल भरपूर नही दिया. नुकसान भी नही हुआ, लागत से कुछ अधिक लाभ देकर ही गया।

 

 

किसान राम राजू कहते है, कि हिमाचल प्रदेश से स्ट्रॉबेरी पौधा लेकर आना रिस्क है, दूरी के कारण खराब हो जाते है, नेतरहाट में तीनो मौसम और तापमान पर नजर रखा गया. कृषि वैज्ञानिक के सलाह से स्ट्रॉबेरी पौधा यही पर विकसित करने का प्रयोग किया गया, प्रयोग सफल रहा, 2020 में नेतरहाट नर्सरी से तैयार हुआ स्ट्रॉबेरी का पौधा पलामू के हरिहरगंज और घाघरा मे लगाया गया था. अब हमारा फोकस केवल स्ट्रॉबेरी पौधा तैयार कर झारखंड, बिहार एवं छत्तीसगढ में इसकी खेती को बढ़ावा देना है, एक एकड भूमि में स्ट्रॉबेरी पौधे की नर्सरी की गई है, इस वर्ष जमशेदपुर, पलामू, लोहरदगा, अंबिकापुर, सीवान से पौधे का ऑडर प्राप्त है, इनको सितंबर, अक्टूबर में पौधा सप्लाई किया जाएगा. नर्सरी में स्ट्रॉबेरी के पजारो, चंदलर, फर्न, आदि विभिन्न किस्मों के पौधे पर भी ट्रायल किया जा रहा है।

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