जमशेदपुर: कभी शहर और गांव के घरों में बागान सिर्फ हरियाली का प्रतीक नहीं होते थे, बल्कि वे एक जीवंत “घरेलू औषधालय” की तरह काम करते थे। लोग कई झाड़ीदार औषधीय पौधों को भाई-बहन की तरह अपनाकर अपने आंगन और बगीचों की घेराबंदी करते थे। लेकिन तेजी से बढ़ते कंक्रीटीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को लगभग खत्म कर दिया है। आज हालत यह है कि ऐसे कई महत्वपूर्ण औषधीय पौधे न सिर्फ बगीचों से, बल्कि समाज से भी धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि शहरीकरण, प्रदूषण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने पृथ्वी के संतुलन को बिगाड़ दिया है। पहले जिन पौधों से बगीचों की घेराबंदी की जाती थी, वे प्राकृतिक रूप से कीट-प्रतिरोधी और औषधीय गुणों से भरपूर होते थे। उनकी गंध और विशेष गुणों के कारण जानवर भी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाते थे, जिससे वे सुरक्षा और उपचार—दोनों का काम करते थे।
निर्गुंडी (सिंदुरवार) ऐसा ही एक पौधा था, जो लगभग हर घर के बागान में पाया जाता था। इसका उपयोग दर्द निवारण में किया जाता था और आयुर्वेद में इससे “निर्गुंडी गुग्गुल” जैसी दवाएं बनती हैं। इसी तरह वासा या वासक का पौधा खांसी और कफ के इलाज में बेहद उपयोगी माना जाता था, जिससे आयुर्वेदिक “वासकावलेह” तैयार होता है। आयापान का पौधा दस्त और पेट संबंधी बीमारियों में कारगर था, जबकि नागदौना, सेहुर, नागफनी, कनेर (श्वेत और लाल), हड्डजोड़ जैसी लताएं और झाड़ियां भी विभिन्न रोगों के उपचार में इस्तेमाल होती थीं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि टाटा स्टील के पुराने क्वार्टर इलाकों में लोहे की पतली पट्टियों के साथ इन औषधीय पौधों की घेराबंदी एक सामान्य दृश्य हुआ करती थी। इससे न केवल हरियाली बनी रहती थी, बल्कि लोगों को जरूरत पड़ने पर तुरंत घरेलू उपचार भी मिल जाता था। लेकिन अब बगीचों की जगह कंक्रीट की दीवारों ने ले ली है, जिससे यह परंपरा पूरी तरह टूट चुकी है।
इस बदलाव का असर सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों में भी लोग ईंट और सीमेंट से बागानों की घेराबंदी करने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि नई पीढ़ी इन पौधों के औषधीय महत्व से अनजान होती जा रही है। पारंपरिक ज्ञान का यह अंतर पीढ़ियों के बीच एक बड़ा गैप पैदा कर रहा है।
आनंद मार्ग और “प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स एंड प्लांट्स” जैसी संस्थाएं अब इस दिशा में जागरूकता अभियान चला रही हैं। गांव-गांव जाकर लोगों को औषधीय पौधों की जानकारी दी जा रही है और मुफ्त में पौधे वितरित किए जा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता सुनील आनंद का कहना है कि अगर हमें पर्यावरण और मानव जीवन को सुरक्षित रखना है, तो फिर से इन पौधों को अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा।
वे बताते हैं कि “हेहर” जैसे पौधे, जो चर्म रोगों के उपचार में उपयोगी थे, अब लगभग लुप्त हो चुके हैं। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि एक ओर हरियाली खत्म हो रही है, वहीं दूसरी ओर घरेलू वनौषधि चिकित्सा पद्धति भी समाप्त होती जा रही है।
पृथ्वी दिवस के अवसर पर यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी पारंपरिक प्राकृतिक विरासत को पूरी तरह खो देंगे, या फिर समय रहते इसे बचाने की दिशा में कदम उठाएंगे। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि छोटे-छोटे प्रयास—जैसे घरों में औषधीय पौधे लगाना—भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

