जमशेदपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में रविवार, 1 नवंबर को बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में जमशेदपुर महानगर की ओर से भव्य शाखा संगम का आयोजन किया गया। इस आयोजन में महानगर की 213 शाखाओं के स्वयंसेवक एक साथ जुटे। विशाल मैदान में स्वयंसेवकों की सामूहिक उपस्थिति, अनुशासन और संगठनात्मक एकात्मता ने संघ के शाखा कार्य की व्यापकता को प्रदर्शित किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण, समाज में संगठन की भावना को मजबूत करने और संघ की ओर से प्रस्तावित पंच परिवर्तन के विचारों को जनजीवन में अपनाने का संदेश देना रहा।
कार्यक्रम में एनआईटी जमशेदपुर के निदेशक डॉ. गौतम सूत्रधर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तर-पूर्व क्षेत्र (बिहार-झारखंड) के बौद्धिक प्रमुख राणा प्रताप ने मुख्य वक्ता के रूप में स्वयंसेवकों को संबोधित किया। दोनों वक्ताओं ने शाखा की उपयोगिता, सामाजिक जीवन में स्वयंसेवकों की भूमिका और राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की जिम्मेदारी पर विस्तार से विचार रखे।
मुख्य अतिथि डॉ. गौतम सूत्रधर ने कहा कि संघ की शाखा व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है। नियमित शाखा में शामिल होने से व्यक्ति के जीवन में अनुशासन, आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, सकारात्मक सोच और सामाजिक दायित्वबोध जैसे गुण विकसित होते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की मजबूती उसके नागरिकों के चरित्र, व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारी पर निर्भर करती है। इस दृष्टि से शाखा के माध्यम से होने वाला व्यक्तित्व विकास समाज और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने संघ की विभिन्न सेवा गतिविधियों, सामाजिक जागरूकता के प्रयासों और समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में स्वयंसेवकों के योगदान की भी सराहना की। उनके अनुसार, शाखा में विकसित संस्कार व्यक्ति को समाज के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार बनाते हैं।
मुख्य वक्ता राणा प्रताप ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संगठित, अनुशासित और राष्ट्रभाव से युक्त समाज के निर्माण की आवश्यकता को ध्यान में रखकर संघ की स्थापना की गई थी। संघ का मूल विचार व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज का संगठन करना और राष्ट्र जीवन को सशक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि शाखा केवल शारीरिक अभ्यास या आपसी मेल-मिलाप का स्थान नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के सर्वांगीण विकास और सामाजिक संस्कारों के निर्माण का माध्यम है। नियमित शाखा से समयबद्धता, सामूहिकता, नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास, सामाजिक समरसता और राष्ट्र के प्रति समर्पण जैसे गुण विकसित होते हैं।
राणा प्रताप ने अपने संबोधन में पंच परिवर्तन की अवधारणा को विशेष महत्व देते हुए कहा कि वर्तमान समय में समाज के भीतर सकारात्मक बदलाव लाने के लिए पांच विषयों पर विशेष रूप से काम करने की आवश्यकता है। इनमें सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी का आचरण और नागरिक कर्तव्य शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता के माध्यम से समाज के सभी वर्गों के बीच आत्मीयता और समानता का भाव मजबूत करना चाहिए। कुटुंब प्रबोधन के तहत परिवार में संस्कार, संवाद और आपसी संबंधों को महत्व देने की जरूरत है। पर्यावरण संरक्षण के लिए जल, जंगल और प्रकृति की रक्षा के साथ दैनिक जीवन में पर्यावरण अनुकूल व्यवहार अपनाना आवश्यक है।
उन्होंने स्वदेशी के आचरण पर जोर देते हुए स्थानीय उत्पादों और देश में निर्मित वस्तुओं को प्राथमिकता देने तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की बात कही। वहीं, नागरिक कर्तव्य के अंतर्गत कानून का पालन, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, स्वच्छता, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। उन्होंने स्वयंसेवकों से आग्रह किया कि पंच परिवर्तन को केवल बौद्धिक चर्चा का विषय न बनाकर अपने परिवार, आसपास के समाज और दैनिक व्यवहार में उतारें। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने आचरण में सकारात्मक बदलाव लाएगा, तभी उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक परिवर्तन के रूप में दिखाई देगा।
शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित इस शाखा संगम में 213 शाखाओं की सहभागिता को जमशेदपुर महानगर में संघ के संगठनात्मक कार्यों और शाखा आधारित गतिविधियों का महत्वपूर्ण प्रदर्शन माना गया। एक ही स्थान पर विभिन्न शाखाओं के स्वयंसेवकों का एकत्र होना सामूहिकता, अनुशासन और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक बना। कार्यक्रम के दौरान शाखा के महत्व और स्वयंसेवकों की नियमित सहभागिता को भी रेखांकित किया गया।
आयोजन का समापन संघ की प्रार्थना के साथ हुआ। इस अवसर पर स्वयंसेवकों ने राष्ट्र निर्माण, समाज के प्रति जिम्मेदारी और संघ के आदर्शों के अनुरूप कार्य करने का संकल्प दोहराया। कार्यक्रम में प्रस्तुत पंक्तियों ने शाखा के प्रति स्वयंसेवकों की निष्ठा और नियमित सहभागिता की भावना को अभिव्यक्त किया—
शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं। मां का वंदन सांझ-सवेरे, श्रद्धा सुमन चढ़ाते हैं।।

