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*शिक्षक दिवस पर जनजातीय भाषा के शिक्षक सम्मानित* *वंदना टेटे और डॉ. मनोरथ बहल ने पाठ्य-पुस्तक लेखन में जुटे शिक्षकों को किया सम्मानित*

चाईबासा: शिक्षक दिवस के अवसर पर जेसीईआरटी, रांची में जनजातीय भाषा विषय की पाठ्य-पुस्तक लेखन कार्य में जुटे शिक्षक-शिक्षिकाओं को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में प्रतिष्ठित लेखिका एवं कवयित्री वंदना टेटे और जेसीईआरटी के उपनिदेशक डॉ. मनोरथ बहल ने विभिन्न जनजातीय भाषाओं के शिक्षक-शिक्षिकाओं को सम्मानित किया।

कार्यक्रम में पश्चिमी सिंहभूम जिले से हो भाषा की पाठ्य-पुस्तक लेखन कार्य से जुड़े कृष्णा देवगम, जगदीश सावैयां, मंगल सिंह मुंडा, लिंडावेंश बिरुवा, दमयंती बिरुवा, रविन्द्र बिरुवा और मेरी सरिता पूर्ति सहित संताली, कुड़ुख, मुंडारी और खड़िया भाषा के शिक्षक-शिक्षिकाएं शामिल रहे।

मुख्य अतिथि वंदना टेटे ने कहा कि शिक्षक समाज के चुने हुए मार्गदर्शक होते हैं। इसलिए शिक्षकों की जिम्मेदारी अन्य लोगों की तुलना में अधिक होती है। उन्होंने जनजातीय भाषाओं की पाठ्य-पुस्तक निर्माण में जुटे बहुभाषी शिक्षक-शिक्षिकाओं से कहा कि जनजातीय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और रोचक जानकारी देने के लिए अपनी भाषा में सोचकर लेखन करना जरूरी है। इससे समाज के वास्तविक संस्कार और ज्ञान पुस्तकों के माध्यम से बच्चों तक पहुंच सकेंगे।

विशिष्ट अतिथि जेसीईआरटी के उपनिदेशक डॉ. मनोरथ बहल ने कहा कि बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए कि वे शिक्षकों को जीवनभर अच्छे मार्गदर्शक के रूप में याद रखें। उन्होंने कहा कि शिक्षण कार्य को बोझ नहीं, बल्कि सेवा के अनमोल अवसर के रूप में देखना चाहिए। इस सोच के साथ शिक्षक स्वस्थ और सकारात्मक रहते हुए बच्चों को बेहतर शिक्षा दे सकते हैं।

कार्यक्रम में सम्मानित अतिथि के रूप में टाटा स्टील फाउंडेशन के एक्सक्यूटिव ऑफिसर शिव शंकर कांडेयांग, सदस्य सोमा जेराई, जगन्नाथ हांसदा, लक्खई बास्के, लेदेम मार्डी, आदिवासी हो महासभा के पदाधिकारी कृष्णा चंद्र बोदरा और नरेश देवगम उपस्थित रहे।

इसके अलावा विभिन्न जिलों से शिक्षक-शिक्षिकाओं में डॉ. निशा नीलम कुजूर, चंद्रावती सारु, सुमन बिलुंग, फालिस्ता बा, कोर्निलियस डुंगडुंग, अनुप कुल्लू, पुडुंगी मुण्डु, सैमसन तानी, डॉ. लक्ष्मी उरांव, गोविंद उरांव, निबय हस्सा और सिसिलिया टूटी सहित अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएं मौजूद थीं। कार्यक्रम में जनजातीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य-पुस्तक निर्माण और बच्चों को उनकी मातृभाषा में बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया।

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