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*एकनाथ रानडे : राष्ट्रसेवा, संगठन और विवेकानंद स्मारक के महान शिल्पकार* *22 अगस्त पुण्यतिथि विशेष*

जमशेदपुर।भारत के राष्ट्रजीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका योगदान केवल किसी एक संस्था, अभियान या निर्माण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनकी पूरी जीवनयात्रा राष्ट्रसेवा की प्रेरणा बन जाती है। एकनाथ रानडे ऐसे ही कर्मयोगी थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित प्रचारक, कुशल संगठनकर्ता और कन्याकुमारी के स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक के प्रमुख शिल्पकार के रूप में उनका नाम भारतीय इतिहास में सदैव स्मरण किया जाएगा। 22 अगस्त 1982 को गणेश चतुर्थी के दिन उनका निधन हुआ। उनकी पुण्यतिथि राष्ट्रसेवा, अनुशासन और संकल्प के प्रति उनके अद्भुत समर्पण को याद करने का अवसर है।

एकनाथ रानडे का जन्म 19 नवंबर 1914 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के टिटिला गांव में हुआ था। गांव में शिक्षा की पर्याप्त सुविधा नहीं थी, इसलिए वे पढ़ाई के लिए नागपुर अपने बड़े भाई के पास आए। वहीं उनके जीवन को नई दिशा मिली। घर के निकट लगने वाली संघ शाखा की गतिविधियों ने उन्हें आकर्षित किया और शीघ्र ही वे बाल शाखा से जुड़ गए। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने उनकी प्रतिभा और संगठन क्षमता को पहचान लिया था।पढ़ाई में मेधावी और परिश्रमी रानडे ने उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद 1936 में स्वयं को संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया। प्रचारक के रूप में उन्होंने मध्य प्रदेश के महाकौशल और छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में संगठन का विस्तार किया। इसी दौरान उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा भी प्राप्त की। अध्ययन और संगठन—दोनों क्षेत्रों में उनकी समान रुचि उनके व्यक्तित्व की व्यापकता को दर्शाती है।

स्वतंत्रता के बाद देश राजनीतिक और सामाजिक संक्रमण से गुजर रहा था। महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया। उस कठिन दौर में रानडे ने भूमिगत रहकर संघ के सत्याग्रह का नेतृत्व किया। प्रतिबंध समाप्त होने के बाद संगठन को पुनः व्यवस्थित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए हिंदू परिवारों के पुनर्वास के लिए कलकत्ता में स्थापित ‘वास्तुहारा सहायता समिति’ के कार्य को भी उन्होंने प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया। बाद में दिल्ली और पंजाब में संघ कार्य को संगठित करने के साथ उन्होंने सरकार्यवाह का दायित्व संभाला और देशभर में संगठन के विस्तार के लिए व्यापक प्रवास किया।लेकिन एकनाथ रानडे का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक योगदान कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक के निर्माण से जुड़ा है। स्वामी विवेकानंद की जन्मशती के अवसर पर कन्याकुमारी की उस शिला पर स्मारक निर्माण का विचार सामने आया, जहां स्वामी विवेकानंद ने ध्यान-साधना की थी। इस कार्य में अनेक प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक बाधाएं थीं। स्मारक के स्वरूप और निर्माण को लेकर मतभेद थे तथा परियोजना के सामने आर्थिक चुनौतियां भी थीं।
तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी ने इस महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी एकनाथ रानडे को सौंपी। रानडे ने इसे केवल पत्थरों से स्मारक बनाने की परियोजना नहीं माना, बल्कि इसे राष्ट्रीय एकात्मता और सांस्कृतिक चेतना का अभियान बना दिया। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों और देश के अनेक वर्गों से संपर्क किया। व्यापक जनसमर्थन जुटाया और लोकसभा के बड़ी संख्या में सदस्यों का समर्थन प्राप्त किया। इसके साथ ही उन्होंने देशभर में धन-संग्रह का अभियान चलाया, जिससे सामान्य नागरिक भी स्मारक निर्माण से जुड़ सके।

उनकी कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता थी—संगठन, संवाद, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता। उन्होंने विरोधों को टकराव के बजाय संवाद और व्यापक जनसमर्थन से दूर करने का प्रयास किया। अंततः कन्याकुमारी की समुद्री शिला पर भव्य विवेकानंद शिला स्मारक साकार हुआ। यह स्मारक आज भारत की सांस्कृतिक चेतना और स्वामी विवेकानंद के राष्ट्रदृष्टि संदेश का महत्वपूर्ण प्रतीक है।
रानडे की दृष्टि केवल स्मारक निर्माण तक सीमित नहीं थी। उनका मानना था कि स्मारक तभी सार्थक होगा, जब वह समाज और राष्ट्र के निर्माण का माध्यम बने। इसी सोच से विवेकानंद केंद्र का विकास हुआ, जिसने शिक्षा, संस्कृति, ग्रामीण विकास, सेवा, योग और राष्ट्रचेतना के क्षेत्रों में कार्य को आगे बढ़ाया। इस प्रकार एक पत्थर की शिला पर बना स्मारक आगे चलकर एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का प्रेरणास्रोत बना।एकनाथ रानडे का जीवन बताता है कि महान कार्य केवल साधनों से नहीं, बल्कि स्पष्ट दृष्टि, अनुशासन और अदम्य इच्छाशक्ति से पूरे होते हैं। उन्होंने निजी महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर संगठन और राष्ट्रहित को जीवन का ध्येय बनाया। वे उन कर्मयोगियों में थे जिन्होंने अपने कार्य का श्रेय स्वयं लेने के बजाय कार्य को ही अपना परिचय बनाया।

आज उनकी पुण्यतिथि पर एकनाथ रानडे को स्मरण करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उनके जीवन से निस्वार्थ सेवा, संगठन शक्ति, राष्ट्रीय एकता और संकल्पबद्ध कर्म की प्रेरणा लेना है। कन्याकुमारी की शिला पर खड़ा स्मारक आज भी मानो यही संदेश देता है कि यदि लक्ष्य राष्ट्रहित का हो और संकल्प दृढ़ हो, तो कठिन से कठिन बाधा भी मार्ग रोक नहीं सकती। एकनाथ रानडे का जीवन इसी अटूट संकल्प का जीवंत उदाहरण है।

वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

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