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*1921 का मोपला विद्रोह: आस्था, आज़ादी और हिंदू त्रासदी* *किसान असंतोष, औपनिवेशिक दमन, धार्मिक राजनीति और सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ा इतिहास का जटिल अध्याय*

जमशेदपुर।भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल वीरता, त्याग और विजय की गाथा नहीं है। उसमें कुछ ऐसे अध्याय भी हैं, जिनकी स्मृति आज तक समाज को बेचैन करती है। 1921 का मोपला विद्रोह या मालाबार विद्रोह ऐसा ही जटिल और पीड़ादायक अध्याय है। केरल के मालाबार क्षेत्र में अगस्त 1921 में शुरू हुआ यह आंदोलन आरंभ में ब्रिटिश शासन, जमींदारी व्यवस्था और किसानों की आर्थिक परेशानियों के विरुद्ध असंतोष से जुड़ा था, लेकिन आगे चलकर इसका एक हिस्सा गंभीर सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया। हिंदू आबादी के विरुद्ध हत्या, लूट, घरों को जलाने, धार्मिक स्थलों पर हमले और जबरन धर्मांतरण की घटनाओं के विवरण मिलते हैं। दूसरी ओर ब्रिटिश दमन और बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार ने त्रासदी को और गहरा किया।मोपला विद्रोह को केवल ‘स्वतंत्रता संग्राम’, ‘किसान विद्रोह’ या ‘सांप्रदायिक हिंसा’ में सीमित कर देना इतिहास की जटिलता के साथ न्याय नहीं होगा। इसके पीछे भूमि संबंधों का संघर्ष, औपनिवेशिक शासन का विरोध, खिलाफत आंदोलन की धार्मिक राजनीति और स्थानीय सामाजिक तनाव एक साथ काम कर रहे थे।

मालाबार की कृषि व्यवस्था में जेनमी यानी पारंपरिक भू-स्वामियों और किरायेदार किसानों के बीच गहरी असमानता थी। बड़ी संख्या में माप्पिला मुसलमान किसान किरायेदार के रूप में खेती करते थे। लगान, बेदखली और भूमि-अधिकार को लेकर उनमें लंबे समय से असंतोष था। ब्रिटिश प्रशासन द्वारा पारंपरिक भू-अधिकारों को कानूनी ढांचे में व्यवस्थित किए जाने से भी कई किरायेदारों में असुरक्षा बढ़ी।
19वीं सदी से ही मालाबार में माप्पिला समुदाय से जुड़े कई विद्रोह हुए थे। हालांकि उनकी प्रकृति समान नहीं थी। कहीं भूमि विवाद प्रमुख था, तो कहीं धार्मिक भावना, स्थानीय सत्ता संघर्ष या व्यक्तिगत प्रतिशोध ने भूमिका निभाई। इसलिए 1921 की घटना को समझने के लिए उसकी लंबी सामाजिक पृष्ठभूमि को देखना आवश्यक है।प्रथम विश्व युद्ध के बाद खिलाफत आंदोलन भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन और हिंदू-मुस्लिम एकता के उद्देश्य से खिलाफत को असहयोग आंदोलन से जोड़ा। मालाबार में कांग्रेस और खिलाफत समितियों की गतिविधियां बढ़ीं। सभाओं और जुलूसों से ब्रिटिश-विरोधी वातावरण मजबूत हुआ।लेकिन जिस क्षेत्र में पहले से भूमि विवाद और धार्मिक तनाव मौजूद थे, वहां राजनीतिक लामबंदी का परिणाम जटिल निकला। अगस्त 1921 में तिरुरंगाड़ी में पुलिस कार्रवाई और खिलाफत नेताओं की गिरफ्तारी के बाद स्थिति विस्फोटक हो गई। माप्पिला विद्रोहियों ने पुलिस थानों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले किए और आंदोलन एरनाड तथा वलुवनाड क्षेत्रों तक फैल गया।
विद्रोह के शुरुआती चरण में इसमें औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध और किसान असंतोष का तत्व स्पष्ट दिखाई देता है। कुछ हिंदू भी प्रारंभिक ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों में शामिल थे। इससे स्पष्ट है कि शुरुआत को सीधे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के रूप में देखना अधूरा होगा।

बाद के चरण में परिस्थितियां तेजी से बदलीं। अनेक स्थानों पर हिंदू नागरिकों की हत्या, लूट, घरों को जलाने, मंदिरों को नुकसान पहुंचाने और जबरन धर्मांतरण की घटनाएं सामने आईं। हिंदू जमींदारों के साथ-साथ आम परिवार भी हिंसा की चपेट में आए। कई परिवारों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित क्षेत्रों में जाना पड़ा।वरियंकुन्नाथ कुंजहम्मद हाजी और अली मुसलियार विद्रोह के प्रमुख चेहरों में उभरे। कुछ क्षेत्रों में समानांतर सत्ता स्थापित करने के प्रयास भी हुए। विद्रोह के इस चरण में धार्मिक प्रतीकों और खिलाफत की भाषा का प्रभाव दिखाई देता है।
मृतकों, धर्मांतरित लोगों और विस्थापित परिवारों की संख्या को लेकर विभिन्न स्रोतों में अंतर है। इसलिए आंकड़ों को लेकर सावधानी आवश्यक है। लेकिन आंकड़ों पर मतभेद का अर्थ यह नहीं कि पीड़ितों की पीड़ा को नजरअंदाज कर दिया जाए। निर्दोष नागरिकों की हत्या, जबरन धर्मांतरण और धार्मिक स्थलों पर हमले किसी भी राजनीतिक या आर्थिक उद्देश्य से उचित नहीं ठहराए जा सकते।मोपला विद्रोह का दूसरा भयावह पक्ष ब्रिटिश दमन था। सेना और मालाबार स्पेशल पुलिस ने विद्रोह को कुचलने के लिए व्यापक अभियान चलाया। गिरफ्तारियां, छापे और मुकदमे हुए। इस कार्रवाई की कीमत आम लोगों ने भी चुकाई।
नवंबर 1921 की ‘वैगन त्रासदी’ इसका सबसे दुखद उदाहरण बनी। बंदियों को एक बंद मालवाहक रेल डिब्बे में अत्यधिक संख्या में ले जाया गया। अपर्याप्त हवा और भीड़ के कारण अनेक बंदियों की दम घुटने से मृत्यु हो गई। यह घटना औपनिवेशिक शासन की कठोरता और अमानवीय प्रशासन का प्रतीक बन गई।इस प्रकार 1921 की त्रासदी के दो चेहरे थे—एक ओर विद्रोही हिंसा और दूसरी ओर औपनिवेशिक दमन। इनके बीच आम नागरिक सबसे अधिक प्रभावित हुए।

मालाबार की हिंसा ने गांधी के खिलाफत-असहयोग प्रयोग पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए। गांधी ने हिंसा और जबरन धर्मांतरण की आलोचना की, लेकिन हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखने पर भी जोर दिया। आलोचकों ने इसे हिंदू पीड़ितों के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता न होने के रूप में देखा, जबकि उनके समर्थकों का तर्क था कि गांधी हिंसा को उचित नहीं ठहरा रहे थे, बल्कि सांप्रदायिक संबंधों को पूरी तरह टूटने से बचाना चाहते थे।इस विषय में गांधी के कथनों को संदर्भ से काटकर नहीं, बल्कि मूल दस्तावेजों और प्रमाणित स्रोतों के आधार पर समझना चाहिए।
इतिहास की सच्ची सीख
मोपला विद्रोह की सबसे बड़ी सीख यही है कि इतिहास को एकरंगी दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। इसमें किसान असंतोष था, औपनिवेशिक शासन का विरोध था, भूमि संबंधी अन्याय था, धार्मिक राजनीति थी, स्थानीय सत्ता संघर्ष था, हिंदू नागरिकों के खिलाफ हिंसा थी और ब्रिटिश दमन भी था।इसे केवल स्वतंत्रता संग्राम कहना हिंदू पीड़ितों की पीड़ा को कम करके आंकना होगा। केवल सांप्रदायिक हिंसा कहना उन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की अनदेखी होगी जिनसे विद्रोह की शुरुआत हुई। और केवल किसान आंदोलन कहना बाद में हुई धार्मिक हिंसा की गंभीरता को छिपाना होगा।

आज एक सदी से अधिक समय बाद इस घटना को याद करने का उद्देश्य किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा करना नहीं, बल्कि अतीत से सीख लेना होना चाहिए। आर्थिक अन्याय का समाधान जरूरी है, धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल में सावधानी जरूरी है और किसी भी समुदाय के निर्दोष लोगों के विरुद्ध हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।इतिहास के घावों को दबाने से वे भरते नहीं हैं। सत्य को स्वीकार करना, पीड़ितों की स्मृति का सम्मान करना और सभी पक्षों की त्रासदी को समझना ही इतिहास के प्रति सच्ची ईमानदारी है। 1921 का मोपला विद्रोह आज भी यही चेतावनी देता है कि जब आर्थिक असंतोष, राजनीतिक उकसावे, धार्मिक उन्माद और प्रशासनिक विफलता एक साथ आते हैं, तो सबसे पहले आम इंसान की जिंदगी तबाह होती है।

वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

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