चाईबासा: आदिवासी हो समाज युवा महासभा के केंद्रीय अध्यक्ष ईपील सामड के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के जिला सदस्य मुन्ना सुंडी ने कहा कि प्रशासन की कार्रवाई को राजनीतिक दबाव का परिणाम बताना पूरी तरह निराधार है। उन्होंने कहा कि प्रशासन कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए अपने संवैधानिक दायित्व के तहत कार्रवाई करता है और किसी भी व्यक्ति या संगठन को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मुन्ना सुंडी ने कहा कि यदि किसी विरोध प्रदर्शन से शहर की कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो, तो प्रशासन का हस्तक्षेप स्वाभाविक है। ऐसी कार्रवाई को आदिवासियों की आवाज दबाने का प्रयास बताना लोगों में प्रशासन और कानून के प्रति भ्रम पैदा करने जैसा है।
उन्होंने कहा कि ईपील सामड को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किसी सार्वजनिक स्थल पर प्रतिमा स्थापना को लेकर एकतरफा विरोध, तनाव और टकराव की स्थिति पैदा करना कितना उचित है। यदि किसी संगठन को किसी निर्णय पर आपत्ति है, तो संविधान और कानून ने संवाद, वार्ता और लोकतांत्रिक विरोध का रास्ता दिया है। किसी भी मुद्दे को टकराव का विषय बनाकर समाज में विभाजन पैदा करना उचित नहीं है।
मुन्ना सुंडी ने कहा कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन केवल झामुमो के नेता नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन के प्रमुख योद्धा और राज्य की पहचान एवं अस्तित्व के लिए संघर्ष करने वाले जननेता रहे हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन जल, जंगल और जमीन तथा आदिवासी-मूलवासी अधिकारों की लड़ाई के लिए समर्पित किया। उनकी प्रतिमा स्थापना को किसी राजनीतिक दल की निजी पहल बताना उनके योगदान को सीमित करने का प्रयास है।
उन्होंने कहा कि झामुमो किसी भी वीर शहीद या महान विभूति के सम्मान के खिलाफ नहीं है। कोल्हान के वीर शहीदों और महापुरुषों का सम्मान करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। लेकिन एक महापुरुष के सम्मान को दूसरे महापुरुष के सम्मान के खिलाफ खड़ा करना समाज को बांटने की राजनीति है, जिसे जनता स्वीकार नहीं करेगी।
मुन्ना सुंडी ने ईपील सामड से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से बचने और सामाजिक सौहार्द तथा आपसी संवाद को मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक पहल करने की अपील की। उन्होंने कहा कि झामुमो लोकतंत्र, संविधान और कानून के सम्मान में विश्वास रखता है तथा कोल्हान की जनता किसी भी तरह के बहकावे में आने वाली नहीं है।

