रांची। राजधानी से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां देश के सबसे वांछित और कुख्यात माओवादी नेताओं में शामिल प्रशांत बोस की शुक्रवार को इलाज के दौरान मौत हो गई। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में भर्ती थे, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली।
प्रशांत बोस पिछले कई वर्षों से बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद थे। वर्ष 2021 के नवंबर महीने में झारखंड पुलिस ने उन्हें सरायकेला-खरसावां जिले के एक टोल प्लाजा से उनकी पत्नी शीला मरांडी के साथ गिरफ्तार किया था। इस गिरफ्तारी को उस समय राज्य में नक्सल विरोधी अभियान की सबसे बड़ी सफलता माना गया था।
करीब छह दशक तक माओवादी संगठन की शीर्ष नेतृत्व में शामिल रहे प्रशांत बोस का नाम देश के कई बड़े नरसंहारों और नक्सली हिंसा की घटनाओं से जुड़ा रहा। जांच एजेंसियों के अनुसार बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में हुए सामूहिक हमलों और नरसंहारों की योजना बनाने में उसकी अहम भूमिका रही थी। 80 और 90 के दशक में बिहार के बघौरा-दलेलचक और बारा नरसंहार जैसे मामलों में भी उसकी संलिप्तता सामने आई थी।
गिरफ्तारी के बाद पुलिस रिमांड के दौरान हुई पूछताछ में प्रशांत बोस ने नक्सली संगठन की रणनीतियों, हमलों की योजना और ‘शहीदी जत्थों’ के गठन से जुड़े कई अहम खुलासे किए थे। अधिकारियों के मुताबिक, उसने पूछताछ के दौरान अपने किए गए कृत्यों पर किसी तरह का पछतावा भी नहीं जताया था।
करीब 85 वर्ष की उम्र में वह कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा था। जेल सूत्रों के अनुसार, चलने-फिरने में असमर्थ हो चुके बोस का अधिकांश समय जेल में पढ़ने और आराम करने में बीतता था। बताया जाता है कि जीवन के अंतिम दिनों में वह श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन कर रहा था और पिछले कुछ महीनों में उसने जेल लाइब्रेरी से गीता का अंग्रेजी संस्करण कई बार लिया था।
उसकी पत्नी शीला मरांडी, जो स्वयं माओवादी संगठन की शीर्ष कमेटी की सदस्य रही है, उसी जेल के महिला वार्ड में बंद है। दोनों की मुलाकात सप्ताह में एक बार कराई जाती थी।
पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के मूल निवासी प्रशांत बोस 1960 के दशक में शुरू हुए नक्सली आंदोलन के शुरुआती दौर से ही इससे जुड़ा रहा। बीते चार दशकों में देशभर में हुई अधिकांश बड़ी नक्सली घटनाओं में उसका नाम सामने आता रहा। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी और कई राज्यों की पुलिस उसे पकड़ने के लिए दशकों तक अभियान चलाती रही।
इससे पहले वह वर्ष 1974 में एक बार गिरफ्तार हुआ था, लेकिन 1978 में जेल से रिहा होने के बाद लंबे समय तक फरार रहा और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना रहा।
उसकी मौत के साथ ही देश के नक्सली इतिहास के एक लंबे और हिंसक अध्याय का अंत माना जा रहा है। हालांकि, सुरक्षा एजेंसियां अब भी उसके नेटवर्क और संगठन के शेष ढांचे को खत्म करने के प्रयास में जुटी हुई हैं।

