चाईबासा: जल के महत्व और संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। आदिवासी युवा मित्र मण्डल, चक्रधरपुर के सचिव रबिन्द्र गिलुवा ने कहा कि यदि समय रहते जल संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है।
उन्होंने बताया कि पृथ्वी पर लगभग 70 प्रतिशत जल है, लेकिन उसमें से केवल 1 प्रतिशत ही पीने योग्य है। शेष जल समुद्र का खारा या बर्फ के रूप में है। ऐसे में सीमित जल संसाधनों का सोच-समझकर उपयोग करना जरूरी है। मानव शरीर में भी लगभग 60 प्रतिशत जल होता है, जिससे इसकी आवश्यकता का महत्व स्पष्ट होता है।
रबिन्द्र गिलुवा ने कहा कि तेजी से बढ़ती आबादी के कारण जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।
नदियों, तालाबों, झीलों और भूजल का अत्यधिक दोहन और प्रदूषण जल संकट को और गहरा बना रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में 85 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में लगभग 45 प्रतिशत जल आपूर्ति भूजल पर निर्भर है, जबकि झारखंड में केवल करीब 12 प्रतिशत लोगों को ही नल से जल की सुविधा मिल रही है।
उन्होंने बताया कि घरेलू कार्यों में पानी का सबसे अधिक उपयोग होता है, जिसमें अक्सर लापरवाही से पानी बर्बाद किया जाता है। नहाने, कपड़े और बर्तन धोने, वाहनों की सफाई और अन्य दैनिक कार्यों में पानी के दुरुपयोग को रोककर काफी हद तक जल बचाया जा सकता है।
जल प्रदूषण को भी एक बड़ी समस्या बताते हुए उन्होंने कहा कि नदियों और तालाबों के प्रदूषित होने से पेयजल संकट गहराने की आशंका है। साथ ही जल की कमी का असर पर्यावरण, वन्यजीव और जीवन के अन्य पहलुओं पर भी पड़ सकता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं सुधरी तो अगले दशक में बड़ी संख्या में लोग जल संकट के कारण पलायन करने को मजबूर हो सकते हैं।
ऐसे में जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाना और इस दिशा में गंभीर कदम उठाना बेहद जरूरी है।

