जमशेदपुर: शहर में आयोजित द्वितीय संभागीय सेमिनार के दूसरे दिन आध्यात्मिक वातावरण और गहन चिंतन के बीच तंत्र साधना के व्यापक स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की गई। आनन्दमार्ग के वरिष्ठ आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने “तंत्र साधना और समाज के ऊपर उसका प्रभाव” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि तंत्र मनुष्य के अंतर्निहित देवत्वबोध को जाग्रत कर उसे परम चेतना में रूपांतरित करने की सशक्त पद्धति है।
आचार्य ने स्पष्ट किया कि तंत्र साधना का मूल उद्देश्य कुलकुण्डलिनी की सुप्त शक्ति को जाग्रत कर उसे परम शिव से मिलाना है। उनके अनुसार तंत्र कोई संकीर्ण धार्मिक पद्धति नहीं, बल्कि आत्म-विस्तार का मार्ग है जो जाति, वर्ण, संप्रदाय और मतवाद की सीमाओं को तोड़कर साधक को व्यापक चेतना की ओर अग्रसर करता है। यह साधना मनुष्य को पशुवत प्रवृत्तियों और मानसिक बंधनों से मुक्त कर उसके संपूर्ण अस्तित्व को उन्नत बनाती है।
व्याख्यान में तंत्र के दार्शनिक आधार पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि इसकी साधनाएं पुरुषतत्त्व और प्रकृतितत्त्व पर आधारित हैं। बीजमंत्रों की सूक्ष्म शक्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ‘ह्रं, क्लीं, ऐं, श्रीं’ जैसे बीजाक्षर चेतना को जाग्रत करने वाले ध्वन्यात्मक सूत्र हैं। तंत्र में वर्णमाला के पचास अक्षरों को पचास बीजशक्तियों के रूप में देखा गया है। शुद्धिकरण, नाड़ी तंत्र, कला, आहार तत्त्व और कुलकुण्डलिनी जैसे विषयों की वैज्ञानिक व्याख्या भी तंत्र शास्त्र में मिलती है।
आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने कहा कि तंत्र में चक्रों, उनसे संबंधित ग्रंथियों और उपग्रंथियों तथा धातुओं का विशद वर्णन है। साधना के मार्ग में संकल्प के चार स्तर बताए गए हैं, जिनके माध्यम से साधक क्रमशः भौतिक चेतना से दिव्य चेतना की ओर अग्रसर होता है। उन्होंने बताया कि तंत्र मानव जीवन में उपस्थित मद, मात्सर्य, क्रोध, अहंकार आदि प्रवृत्तियों पर नियंत्रण का मार्ग दिखाता है तथा अष्टपाश और षडरिपुओं से मुक्ति का उपाय प्रस्तुत करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि साधना की उन्नत अवस्था में साधक को अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व, वशित्व और अन्तर्यामित्व जैसी सिद्धियों की प्राप्ति हो सकती है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इन सिद्धियों का उद्देश्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मोन्नति और लोककल्याण है।
अपने संबोधन के समापन में आचार्य ने कहा कि तंत्र साधना केवल व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और शांति का मार्ग भी है। जब व्यक्ति अपने भीतर के देवत्व को पहचान लेता है, तब उसका आचरण स्वतः ही परिष्कृत हो जाता है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का सूत्रपात होता है। उन्होंने उपस्थित साधकों से आह्वान किया कि वे तंत्र साधना को जीवन में अपनाकर व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर संतुलन, सफलता और शांति का अनुभव करें।

