नोआमुंडी। पश्चिमी सिंहभूम जिला स्थित नोआमुंडी झारखंड खनन क्षेत्र के रूप में पहचान रखने वाले इस इलाके में एक बदलाव चुपचाप आकार ले चुका है। यह बदलाव किसी प्रचार या शोरगुल से नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास, मानवीय संवेदना और व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाने की प्रतिबद्धता से संभव हुआ है। झारखंड का नोआमुंडी प्रशासनिक खंड अब वह पहला क्षेत्र बन गया है जहाँ हर पात्र दिव्यांग व्यक्ति की पहचान की गई, उनका प्रमाणन किया गया और उन्हें उपयुक्त सरकारी कल्याण योजनाओं से जोड़ा गया। वर्षों से सरकारी आंकड़ों में इन नागरिकों की उपस्थिति न्यूनतम रही थी, ऐसे में यह उपलब्धि केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि अधिकारों और सम्मान की पुनर्स्थापना मानी जा रही है।
इस परिवर्तन की धुरी बना है टाटा स्टील फाउंडेशन का दिव्यांगता समावेशन कार्यक्रम ‘सबल’। वर्ष 2017 में शुरू हुई यह पहल दिव्यांगता को अधिकार के नजरिए से देखने और प्रणालीगत बदलाव सुनिश्चित करने का प्रयास रही है। सबल ने यह साबित किया है कि यदि व्यवस्था को हर नागरिक तक पहुँचाने का संकल्प हो, तो ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में भी समावेशन अपनी पूरी प्रभावशीलता के साथ संभव है।
अब तक ग्रामीण भारत में अधिकतर दिव्यांग लोग प्रशासनिक ढांचे से परे और सरकारी निगाहों से दूर रहे हैं। जागरूकता, प्रशिक्षण और डेटा सिस्टम की कमी के कारण वे अक्सर योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं। नोआमुंडी भी इसी स्थिति से जूझता रहा था। लेकिन सबल ने इस अदृश्यता को चुनौती दी। RPwD एक्ट 2016 की भावना के अनुरूप कार्यक्रम ने लक्ष्य रखा—किसी एक को भी पीछे नहीं छोड़ा जाएगा।
रणनीति जमीनी स्तर से लागू हुई। स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सभी 21 प्रकार की दिव्यांगताओं की पहचान करने का प्रशिक्षण मिला। डिजिटल ऐप की मदद से प्रत्येक लाभुक की वास्तविक समय की जानकारी दर्ज की गई। पंचायतों और सरकारी विभागों को इस प्रक्रिया का सहभागी बनाया गया, ताकि यह समावेशन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन सके। परिणाम स्वरूप—कुछ ही महीनों में नोआमुंडी ने 100% दिव्यांग पहचान और प्रमाणीकरण का कीर्तिमान स्थापित कर दिया।
यह उपलब्धि सिर्फ कागज़ी लाभ देने तक सीमित नहीं रही। दिव्यांग व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ाए गए।
अब तक 292 पात्र लोगों को आजीविका आधारित कार्यक्रमों से जोड़ा जा चुका है — जिनमें कौशल प्रशिक्षण, उद्यमिता सहायता और रोजगार अवसर शामिल हैं। साथ ही सहायक तकनीक ने उनकी दिनचर्या में स्वतंत्रता जोड़ दी है। IIT दिल्ली की AssistTech लैब के सहयोग से चल रही ‘ज्योतिर्गमय’ पहल के जरिए दृष्टिबाधित नागरिक अब पढ़ने–लिखने, बैंकिंग से लेकर डिजिटल दुनिया में आत्मविश्वास से आगे बढ़ पा रहे हैं।
नोआमुंडी का यह मॉडल साबित करता है किसमावेशन कोई दान नहीं—यह प्रभावी और संवेदनशील प्रशासन का परिणाम है। जहाँ व्यवस्था सभी को “देखने” लगे और समुदाय जिम्मेदारी महसूस करे, वहाँ बदलाव स्वयं ही व्यापक रूप ले लेता है। यही कारण है कि यह मॉडल अब झारखंड के अन्य जिलों के साथ ओडिशा में भी विस्तार पा रहा है।
दरअसल, विकास तब सार्थक होता है जब वह हर व्यक्ति को साथ लेकर चले।
नोआमुंडी ने यह कर दिखाया है—यह संदेश देते हुए कि जहाँ गरिमा केंद्र में हो, वहीं सच्चा समावेशन जन्म लेता है। यहाँ अब कोई भी अदृश्य नहीं है—हर व्यक्ति पहचाना गया है, स्वीकार किया गया है, और शामिल किया गया है।

