मातृभूमि की वंदना में अनेकों ने अपनी- अपनी स्वर साधनाएं प्रस्तुत की परंतु सबसे ऊंचा स्वर ब्रह्मचारी सुभाष का था। यही एक साधक थे ,जिन्होंने एक बार नहीं, अनेकों बार गांधी जी जैसे कूटनीतिज्ञ व्यक्ति से भारत के सार्वजनिक क्षेत्र में टक्कर ली। इनका जन्म उड़ीसा के राजधानी कटक में 23 जनवरी सन् 1897 को हुआ था। देश आजादी के लिए आंदोलनरत पोटका का कालिकापुर गांव आज भी इतिहास के पन्नों से अछूता है। यहां कुम्हारों के नेतृत्व में अंग्रेजों के दमन शासन के खिलाफ तत्कालीन कालिकापुर थाना तोड़फोड़ व दारोगा काली प्रसाद की पिटाई का खबर जैसे ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लगी तो उस समय 5 दिसंबर 1939 को नेताजी सुभाष बोस जमशेदपुर से सड़क मार्ग पर हाता होते हुए कालिकापुर में एक जनसभा को संबोधित करने हेतु पहुंचे थे। उनके पहुंचते ही पूरा वातावरण शंख ध्वनि, उल्लू ध्वनि से गुंजयामान हो गया। तत्कालीन समाजसेवी ईशान चंद्र भगत एवं वरिष्ठ ग्रामीणों के द्वारा उन्हें सभा स्थल तक ले जाया गया जहां बालीपोस गांव के ब्राह्मण शिवराम पंडा के द्वारा नेताजी को फुल चंदन लगाया गया । तत्कालीन बालिका चंद्रमुखी भगत एवं विमला दत्त ने सर्वप्रथम मंच पर नेताजी को माल्यार्पण किए ।जनसभा की अध्यक्षता आंदोलन के नेतृत्वकर्ता स्वर्गीय ईशान चंद्र भगत एवं संचालन शिक्षाविद व कविराज कमल लोचन भगत ने किये थे। कहते हैं उस समय नेताजी क्षेत्र के आदिवासी मूलवासीओं को संबोधित करते हुए एक होकर अंग्रेज के खिलाफ लड़ने का आह्वान किए जो पोटका के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी ।
उनकी सृति के रूप में आज भी कल का पुर गांव के डॉक्टर विकास चंद्र भगत प्रत्येक वर्ष सुभाष चंद्र बोस के जन्म जयंती के अवसर पर उनके सभा स्थल के फोटो रखकर पुष्प अर्पित करते हैं और उसके चिन्हों पर चलने का संकल्प लेते हैं पोटका के कालकापूर में1994 मैं द्वितीय मुखिया हरे कृष्ण भगत द्वारा सरकारी अनुदान से दिए नेताजी चबूतरा, सुभाष चंद्र उच्च विद्यालय आज भी विराजमान है। साथ ही साथ आंदोलन के नेतृत्वकर्ता स्वर्गीय ईशान चंद्र भगत के वंशज डॉक्टर विकास चंद्र भगत ने नेताजी के स्मृति में ,सभा के दौरान नेता जी जिस कुर्सी पर बैठे थे वह कुर्सी एवं सामने रखी टेबल को संजोकर रखे हुए हैं।
भारत के अमर सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस का पोटका दौरा क्षेत्र के लिए प्रेरणा स्रोत

