महुआडांड़ संवाददाता शहजाद आलम की रिपोर्ट

झारखण्ड मे आदिम जनजाति परिवार आदिकाल से ही जंगल और पहाड़ में रहकर जीवन यापन करते आ रहे हैं। इनसे ही झारखंड की पहचान भी है। लेकिन झारखंड राज्य को बने दो दशक गुजर जाने के बाद भी आज तक इस विशेष आदिवासी समुदाय की स्तिथि बदहाल ही दिखाई देती है। महुआडांड़ प्रखंड के पंचायत दूरूप के मेढारूवा ग्राम के बालामहुआ गांव के रहने वाले चन्द्र विरिजिया एवं पत्नी तरसीला विरिजियाईन जहां इनके चार बच्चे है। आदिम जन जातिय यह परिवार आज तक सरकारी सुविधाओ से पूरी तरह वंचित है, चन्द्र विरिजिया का पूरा परिवार पलायन करके जीवन का गुजारा करता है। इसके बच्चो को शिक्षा तक नसीब नही है। इसके पास रहने को घर नही है। वर्तमान यह परिवार ईट और मिट्टी के दीवार उठा कर उसपे चदरा डालकर रह रहा है। वही चन्द्र विरिजिया को कल्याण विभाग ( डाकिया योजना ) की ओर से मिलने वाला खाद्यान्न भी मयस्सर नहीं हो रहा है। बिरसा आवास का लाभ भी नहीं मिला है। वही जुलाई 2021 मे दो साल बाद यूपी से लौटे इस आदिम जन जातिय परिवार को बरसात का मौसम काटना बेहद मुश्किल भरा है। प्रखंड मुख्यालय से बालामहुआ गांव की दूरी 20 किलोमीटर है।
चन्द्र विरिजिया ने बताया, कि गांव मे काम नही मिलने के कारण दो साल पहले मै पूरे परिवार के साथ उत्तर प्रदेश के फैजाबाद शहर मे काम करने चला गया था। जहां ईट भट्टा मे काम करता था। जुलाई मे जब गांव लौटा तो मेरा मिट्टी का घर बरसात मे गिर चुका था। राशन कार्ड से भी मेरा नाम काट दिया गया है। गांव मे रोजगार नही रहने के कारण हम बाहर कमाने जाते है, बरसात मे लौट आते थे।लेकिन करोना के कारण 2020 मे नही लौट पाया। जब जुलाई 2021 मे घर लौटा तो रहने के लिए छत नही बचा था। किसी तरह से दीवार उठाकर उसमे छत लगाकर रहता हूं। कमाकर जो पैसा लाया था वह भी छत खड़ा करने मे खत्म हो गया। काम भी नही मिल रहा है।
नरेगा वाच सह भोजन के अधिकार सदस्य जेम्स हेरेंज ने कहा चन्द्र विरिजिया जैसे लोगों की खबरें जिला के विभिन्न हिस्सों से अक्सर छनकर आती हैं। यह जिले के लिए बेहद दुखद है, आजादी के 75 सालों बाद भी अपने नागरिकों को उनके बुनियादी जरूरतों को पुरा न करना राज्य की विफलता ही कही जाएगी।

