Breaking
Sun. Jun 21st, 2026

प्रख्यात साहित्यकार व समाजसेवी हाराधन अधिकारी नहीं रहे, साहित्य और सेवा जगत में शोक की लहर

जमशेदपुर। बंगला साहित्य और समाजसेवा के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार एवं समाजसेवी हाराधन अधिकारी का शनिवार देर रात सारजामदा बावनगोड़ा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह 75 वर्ष के थे। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे अधिकारी पिछले एक वर्ष से बीमारी से जूझ रहे थे। ब्रेन हेमरेज के बाद पिछले पांच महीनों से वे बिस्तर पर थे। उनके निधन की खबर से साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

हाराधन अधिकारी ने अपने जीवन का अधिकांश समय साहित्य सृजन और समाजसेवा को समर्पित किया। टाटा स्टील के जनस्वास्थ्य विभाग में कार्यरत रहने के दौरान भी उनकी साहित्यिक गतिविधियां जारी रहीं। बाद में उन्होंने साहित्य और सामाजिक कार्यों को पूरा समय देने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया और अपना पूरा जीवन समाज तथा साहित्य की सेवा में लगा दिया।

बंगला साहित्य में उनकी कहानियां और उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय रहे। उनकी रचनाओं में समाज के गरीब, शोषित और वंचित वर्ग की पीड़ा और संघर्ष प्रमुखता से दिखाई देते थे। उनकी कई चर्चित कहानियों का हिंदी में अनुवाद हुआ और देश की विभिन्न हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुआ। साहित्यिक योगदान के साथ-साथ वे मासिक पत्रिका ‘सिंहभूम वार्ता’ के सह-संपादक के रूप में भी जुड़े रहे। इसके अलावा वे परसुडीह समाज कल्याण समिति के सक्रिय सदस्य थे तथा ‘पंचपल्लव’ जैसी साहित्यिक कृतियों से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा।

समाजसेवा के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत प्रेरणादायी रहा। वर्ष 1982 से उन्होंने गरीब, अनाथ और जरूरतमंद परिवारों की सहायता का सिलसिला शुरू किया, जो जीवनभर जारी रहा। उन्होंने लगभग 53 गरीब एवं अनाथ कन्याओं के विवाह संपन्न कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें चार अनाथ युवतियों का कन्यादान स्वयं किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक धर्मार्थ होम्योपैथिक चिकित्सालय का संचालन किया और कुष्ठ रोगियों की सेवा में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

स्वास्थ्य जागरूकता के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे प्रत्येक वर्ष बस्तियों में रहने वाले हजारों बच्चों को चेचक निवारक दवा उपलब्ध कराते थे। बताया जाता है कि हर साल करीब 20 हजार बच्चों तक यह दवा पहुंचाने का कार्य उनकी पहल पर किया जाता था।

उनकी साहित्यिक एवं सामाजिक सेवाओं के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें उद्दीप्त पुरस्कार, आशापूर्णा देवी पुरस्कार, विवेकानंद स्मृति पुरस्कार, मानव रत्न सम्मान सहित कई महत्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हुए। नाट्य, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें ‘उत्तरबंग नाट्यजगत् पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया था।

“नर सेवा ही नारायण सेवा” के सिद्धांत को जीवन में उतारने वाले हाराधन अधिकारी ने समाज के कमजोर, वंचित और जरूरतमंद लोगों के उत्थान के लिए जो कार्य किए, वे लंबे समय तक याद किए जाएंगे। उनके निधन से साहित्य और समाजसेवा जगत ने एक संवेदनशील, कर्मशील और समर्पित व्यक्तित्व को खो दिया है। उनके परिवार में तीन भाई हैं।

Related Post