चाईबासा: आदिवासी उरांव समाज के चार अखाड़ा बान टोला, कुम्हार टोली, तेलंगाखुरी एवं नदीपार अखाड़ा द्वारा प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी वैशाख शुक्ल पक्ष की शुभ बेला में रविवार को वनभुजनी पूजा का आयोजन किया गया।
पूजा का आयोजन समाज के पाहन (पुजारी) फागु खलखो, पनभरवा मंगरू टोप्पो, चमरू लकड़ा तथा सहयोगी संजय कुजूर और सुनील बरहा द्वारा सरना स्थल (चाला मंडप) में किया गया। वहीं रात में पाहन और पनभरवा द्वारा टोला-मोहल्ले की सुख-समृद्धि के लिए अखाड़ों में ग्राम देवी-देवताओं की पूजा की जाएगी।
परंपरा के अनुसार इस दिन मुहल्ले के सभी घरों में रात को घर के बाहर आंगन में चूल्हा बनाकर भोजन तैयार किया जाता है और सभी लोग आपस में मिलकर भोजन ग्रहण करते हैं। देर रात पूजा के बाद छोटे बच्चे निर्वस्त्र होकर हाथ में डंडा लिए पूरे टोला-मोहल्ले का भ्रमण करते हैं।
मान्यता के अनुसार लोग अपने-अपने घरों के बाहर आंगन में एक हंडी रखते हैं, जिसे बच्चे घूम-घूमकर फोड़ते हैं। इसके बाद सभी बच्चे श्मशान काली के पास एक पेड़ के नीचे एकत्र होकर नियमानुसार पूजा-पाठ करते हैं और फिर नदी में स्नान कर वस्त्र पहनकर लौटते हैं। ऐसी मान्यता है कि जिस घर से हंडी नहीं निकलती, वहां से दुख-दर्द दूर नहीं होता।
अगले दिन सुबह फोड़ी गई हंडियों को पाहन पुजारी की धर्मपत्नी के नेतृत्व में मुहल्ले की महिलाएं उठाकर साफ-सफाई करती हैं और उसे श्मशान काली मंदिर के एकांत स्थान या मुहल्ले की सीमा के बाहर फेंकने के बाद स्नान कर अपने घर लौटती हैं। इसके बाद ही पूजा संपन्न मानी जाती है।
इस अवसर पर समाज के मुखिया लालू कुजूर के अलावा राजेन्द्र कच्छप, शंभू टोप्पो, सीताराम मुंडा, जगरनाथ टोप्पो, हुरिया बरहा, शंकर कच्छप, बिशु कुजूर, डीवी तिर्की, दिलीप कच्छप, देवानंद लकड़ा, बिट्टू कच्छप, कर्मा कुजूर, बिष्णु तिर्की, कुंजल कच्छप, पटेल टूटी, छोटे लकड़ा, सुकरा कच्छप, सुनील खलखो, नवीन कच्छप, सुजल तिर्की, कलिया कुजूर, भोला कुजूर सहित अन्य लोग उपस्थित थे।

