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200 फीट ऊँचाई पर शक्ति का रहस्य, तलाई पहाड़ में आज भी होती है माँ की अनुभूति

जमशेदपुर। पूर्वी सिंहभूम जिला से सटे राजनगर–पोटका प्रखंड की सीमा पर स्थित तलाई (तिलाई) पहाड़ एक बार फिर श्रद्धा, विश्वास और परंपरा का साक्षी बना, जब मकर पर्व के दूसरे दिन ‘अखान दिन’ पर माँ ठाकुरानी की भव्य पूजा-अर्चना पूरे विधि-विधान के साथ सम्पन्न हुई। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही उस आस्था की जीवंत तस्वीर है, जिसके पीछे एक सच्ची और प्रेरक घटना जुड़ी हुई है।

सुबह से ही डांगरडीहा, सिजुलता, हेंसल, पाटा हेंसल समेत आसपास के गांवों में भक्तिमय माहौल बन गया। ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु और “जय माँ ठाकुरानी” के जयकारों के बीच पूरा इलाका मानो देवीमय हो उठा। हेंसल गांव स्थित ठाकुरानी मंदिर में नायके बाबा भीम सरदार और ग्राम प्रधान अशोक गोप के पुत्र मनिन्द्र गोप द्वारा सबसे पहले विधिवत पूजा-अर्चना की गई।

इसके बाद श्रद्धालुओं का जत्था पाटा हेंसल स्थित ठाकुरानी मंदिर पहुंचा, जहां सामूहिक रूप से मां से सुख, शांति और समृद्धि की कामना की गई। यहीं से आस्था की सबसे कठिन लेकिन सबसे पवित्र यात्रा शुरू होती है। मंदिर में पूजा के उपरांत सभी श्रद्धालु लगभग 200 फीट ऊँचे तलाई पहाड़ की चोटी की ओर बढ़े। ऊबड़-खाबड़ रास्ता, ऊँचाई और थकान—इन सबके बीच केवल विश्वास ही था, जो भक्तों को आगे बढ़ाता रहा।

पहाड़ की चोटी पर स्थित कुंआनुमा प्राचीन पूजा स्थल पर पहुंचते ही माहौल और भी दिव्य हो गया। मान्यता है कि यहीं माँ ठाकुरानी स्वयं प्रकट होकर गांव की रक्षा और कल्याण का वरदान देती हैं। इसी विश्वास के कारण वर्षों पहले एक सच्ची घटना के बाद इस पूजा की परंपरा शुरू हुई, जिसे आज भी गांव के लोग पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं। मां की विशेष आराधना के दौरान पहाड़ “जय माँ ठाकुरानी” के जयघोष से गूंज उठा और वातावरण पूरी तरह भक्तिरस में डूब गया।

स्थानीय ग्रामीणों ने पूरे आयोजन को शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से सम्पन्न कराने में अहम भूमिका निभाई। सुरक्षा, व्यवस्था और परंपराओं का विशेष ध्यान रखा गया, ताकि हर श्रद्धालु बिना किसी बाधा के मां के दर्शन कर सके। इस पावन अवसर पर उज्ज्वल मोदक, अमरनाथ गोप, पोल्टू गोप, बिमल गोप, भोलानाथ गोप, बद्रीनाथ महाकुड़, कृष्णा नामता, जेना माझी, विष्णु गोप, अशोक मिस्त्री, अरूप मंडल, खोकन मंडल, तपन गोप सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु उपस्थित रहे।

तलाई पहाड़ की यह पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी परंपरा, लोकविश्वास और सामूहिक एकता का प्रतीक है। हर साल अखान दिन पर दोहराई जाने वाली यह कठिन चढ़ाई और पवित्र आराधना यह संदेश देती है कि जब विश्वास सच्चा हो, तो आस्था हर ऊँचाई को पार कर लेती है।

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