चैंबर ने झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग (JSERC) को सौंपी गई आपत्ति में इस प्रस्ताव को अत्यधिक, तर्कहीन, उपभोक्ता-विरोधी एवं नियामक सिद्धांतों के विपरीत बताया है।
चैंबर की आपत्ति JBVNL द्वारा स्वयं प्रस्तुत ट्रू-अप (FY 2024–25), एपीआर (FY 2025–26) एवं एमवाईटी (FY 2026–27 से 2030–31) के आंकड़ों के विस्तृत अध्ययन पर आधारित है। चैंबर का कहना है कि घरेलू, वाणिज्यिक, औद्योगिक और कृषि—सभी श्रेणियों में 50% से 90% तक प्रस्तावित वृद्धि आम उपभोक्ताओं, व्यापारियों, उद्योगों और किसानों की वहन क्षमता से कहीं अधिक है। इससे न केवल बिजली की मांग घटेगी, बल्कि राज्य की आर्थिक गतिविधियों और विकास की गति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
सिंहभूम चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष मानव केडिया ने कहा कि जब कोयले की कीमतों में गिरावट, ऊर्जा बिक्री में कमी और राष्ट्रीय स्तर पर दक्षता बढ़ाने पर जोर है, तब इतनी तीव्र टैरिफ वृद्धि का कोई ठोस आर्थिक आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि JBVNL की उच्च वितरण एवं एटीएंडसी हानियां, बिजली चोरी, कमजोर अवसंरचना और प्रबंधन की अक्षमताओं का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डालना न तो न्यायसंगत है और न ही कानूनन स्वीकार्य। आयोग को उपभोक्ता संरक्षण और लागत-आधारित टैरिफ निर्धारण के अपने वैधानिक दायित्व का निर्वहन करना चाहिए।
चैंबर के उपाध्यक्ष (उद्योग) हर्ष बांकरेवाल ने कहा कि जमशेदपुर राज्य का प्रमुख औद्योगिक और रोजगार केंद्र है। प्रस्तावित टैरिफ वृद्धि से एमएसएमई एवं बड़े उद्योगों की उत्पादन लागत 15–20% तक बढ़ सकती है, जिससे उनकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर होगी। इसका सीधा असर नए निवेश, विस्तार योजनाओं और रोजगार सृजन पर पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिजली उद्योगों के लिए एक मूलभूत इनपुट है, न कि उपयोगिता की अक्षमताओं की भरपाई का साधन।
चैंबर ने यह भी रेखांकित किया कि JBVNL लगातार एमवाईटी के तहत निर्धारित प्रदर्शन लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है। नियामक ढांचे के अनुसार ऐसी विफलता की स्थिति में लागत अस्वीकृति और सुधारात्मक निर्देश होने चाहिए, न कि टैरिफ में भारी वृद्धि। इसके अतिरिक्त, वर्षों से संचित राजस्व घाटे को वर्तमान उपभोक्ताओं पर लादना अंतर-पीढ़ीगत अन्याय के समान है।
चैंबर ने यह भी जानकारी दी कि नियामक प्रक्रिया के तहत याचिकाकर्ता/JBVNL को अपनी प्रत्युत्तर (Reply) नवीनतम 16 जनवरी 2026 तक दाखिल करनी है। इसके पश्चात सभी हितधारकों को यह अधिकार होगा कि वे सार्वजनिक सुनवाई की तिथि पर अथवा अधिकतम 23 जनवरी 2026 तक अपना प्रत्युत्तर (Rejoinder) प्रस्तुत कर सकें। सिंहभूम चैंबर ने सभी प्रभावित उपभोक्ताओं और औद्योगिक संगठनों से इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया है।
अंत में, सिंहभूम चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने आयोग से आग्रह किया है कि वह प्रस्तावित टैरिफ वृद्धि को वर्तमान स्वरूप में अस्वीकार करे, मानक से अधिक हानियों की वसूली पर रोक लगाए, टैरिफ को प्रदर्शन से जोड़े, लागत आंकड़ों में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करे तथा विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 61 एवं 62 के तहत उपभोक्ता हितों की प्रभावी रक्षा करे। चैंबर ने विश्वास व्यक्त किया कि आयोग जनहित, औद्योगिक विकास और नियामक निष्पक्षता को सर्वोपरि रखते हुए संतुलित और न्यायोचित निर्णय देगा।

