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झारखंड में सड़कें बन रहीं मौत की राह, छह माह में 2,478 मौतें; पांच साल में 20 हजार से अधिक लोगों ने गंवाई जान

रांची। झारखंड में सड़क दुर्घटनाएं लगातार गंभीर मानवीय संकट का रूप लेती जा रही हैं। राष्ट्रीय स्तर के सड़क दुर्घटना आंकड़ों और राज्य पुलिस मुख्यालय से सामने आए आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो स्थिति चिंताजनक है। जनवरी से जून 2026 तक राज्य में 3,078 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 2,478 लोगों की मौत हुई। यानी छह महीने में औसतन प्रतिदिन करीब 17 सड़क हादसे हुए और करीब 14 लोगों ने जान गंवाई।

राज्य में सड़क दुर्घटनाओं की गंभीरता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2021 में 3,513, वर्ष 2022 में 3,898, वर्ष 2023 में 4,173 और वर्ष 2024 में 4,114 लोगों की सड़क हादसों में मौत हुई। वर्ष 2024 में राज्य में 5,196 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुई थीं।

पांच साल में मौत का आंकड़ा 20 हजार के पार

वर्ष 2021 से 2025 तक के उपलब्ध आंकड़ों को देखें तो झारखंड में सड़क हादसों में मौत का आंकड़ा लगातार चार हजार के आसपास या उससे ऊपर रहा है। वर्ष 2021 में 3,513, 2022 में 3,898, 2023 में 4,173 और 2024 में 4,114 लोगों की मौत हुई। वहीं वर्ष 2025 में उपलब्ध पुलिस आंकड़ों के अनुसार जनवरी से नवंबर तक सड़क दुर्घटनाओं में 4,111 लोगों की मौत दर्ज की गई।

इन आंकड़ों को जोड़ने पर पांच वर्षों में मृतकों की संख्या 20 हजार से अधिक हो जाती है। हालांकि 2025 का आंकड़ा जनवरी से नवंबर तक का है, इसलिए इसे पूरे कैलेंडर वर्ष का अंतिम आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा। इसी तरह 2026 के 2,478 मौतों का आंकड़ा भी केवल जनवरी से जून की अवधि का है।

छह महीने में रांची में सबसे ज्यादा हादसे

राज्य पुलिस मुख्यालय के जनवरी से जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार रांची जिले में सबसे अधिक 408 सड़क दुर्घटनाएं हुईं और इनमें 286 लोगों की मौत हुई। धनबाद में 208 हादसों में 118, हजारीबाग में 195 हादसों में 163 और गिरिडीह में 194 हादसों में 180 लोगों की जान गई।

पलामू में 170 दुर्घटनाओं में 135, बोकारो में 169 में 125, पूर्वी सिंहभूम में 166 में 117, गुमला में 150 में 136, दुमका में 134 में 122 और रामगढ़ में 126 दुर्घटनाओं में 107 लोगों की मौत हुई।

देवघर में 121 हादसों में 86, सरायकेला-खरसावां में 125 में 107, पश्चिमी सिंहभूम में 117 में 114, चतरा में 84 में 77, सिमडेगा में 83 में 82, लातेहार में 83 में 65, गोड्डा में 72 में 64 और साहिबगंज में 69 दुर्घटनाओं में 55 लोगों की मौत हुई।

लोहरदगा में 58 हादसों में 51, कोडरमा में 58 में 42, जामताड़ा में 45 में 41 और पाकुड़ में 43 सड़क दुर्घटनाओं में 42 लोगों की जान गई।

कम हादसे, लेकिन मौत का अनुपात ज्यादा

आंकड़ों का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई जिलों में दुर्घटनाओं की संख्या कम होने के बावजूद मृतकों की संख्या बहुत अधिक है। गिरिडीह में 194 हादसों में 180 मौतें, गुमला में 150 हादसों में 136 मौतें, पश्चिमी सिंहभूम में 117 हादसों में 114 मौतें और सिमडेगा में 83 हादसों में 82 मौतें दर्ज हुईं।

इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि कुछ जिलों में सड़क दुर्घटना होने के बाद उसके जानलेवा साबित होने की संभावना अधिक है। सड़क की स्थिति, वाहनों की गति, दुर्घटना के बाद चिकित्सा सुविधा तक पहुंचने में लगने वाला समय, रात में दृश्यता और ब्लैक स्पॉट जैसे कारणों की भूमिका हो सकती है। हालांकि किसी विशेष दुर्घटना में मौत का कारण पुलिस जांच और संबंधित विभाग की रिपोर्ट के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है।

कोल्हान में भी सड़क सुरक्षा बड़ी चुनौती

कोल्हान के तीनों जिलों में भी सड़क दुर्घटनाएं बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। जनवरी से जून 2026 के दौरान पूर्वी सिंहभूम में 166 दुर्घटनाओं में 117 लोगों की मौत, पश्चिमी सिंहभूम में 117 दुर्घटनाओं में 114 लोगों की मौत और सरायकेला-खरसावां में 125 दुर्घटनाओं में 107 लोगों की मौत दर्ज हुई।

पश्चिमी सिंहभूम की स्थिति विशेष रूप से गंभीर रही है। उपलब्ध जिला स्तरीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में जिले में 209 सड़क दुर्घटनाओं में 214 लोगों की मौत हुई थी। जनवरी से जून 2026 तक 117 हादसों में 114 लोगों की जान गई।

पूर्वी सिंहभूम में भी वर्ष 2025 में 273 सड़क दुर्घटनाओं में 176 लोगों की मौत हुई थी। जिले में जमशेदपुर से घाटशिला, चाईबासा, मुसाबनी, बहरागोड़ा और अन्य मार्गों पर सड़क सुरक्षा को लेकर लगातार निगरानी की जरूरत बनी हुई है।

राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी खतरा

राष्ट्रीय राजमार्गों पर दुर्घटनाओं की संख्या की तुलना में मौतों का अनुपात भी गंभीर चिंता पैदा करता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में झारखंड के राष्ट्रीय राजमार्गों पर 313 दुर्घटनाओं में 291 लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2024 में 427 दुर्घटनाओं में 354 और वर्ष 2025 में 383 दुर्घटनाओं में 326 लोगों की मौत दर्ज हुई।

ब्लैक स्पॉट के आसपास एंबुलेंस की तैनाती, सड़क सुरक्षा उपकरणों की स्थापना और दुर्घटना के बाद घायलों को गोल्डन ऑवर में अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।

तेज रफ्तार सबसे बड़ा कारण

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़ों के अनुसार झारखंड में 3,715 दुर्घटनाएं तेज रफ्तार से जुड़ी थीं। इन हादसों में 2,910 लोगों की मौत हुई और 2,149 लोग घायल हुए। आंकड़े बताते हैं कि तेज रफ्तार सड़क दुर्घटनाओं में मौत का प्रमुख कारण बनी हुई है।

इसके अलावा शराब या नशीले पदार्थों के प्रभाव में वाहन चलाना, गलत तरीके से ओवरटेकिंग, हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल नहीं करना, वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल और सड़क की खराब स्थिति भी दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

शाम के समय बढ़ जाता है हादसों का खतरा

NCRB के 2024 के आंकड़ों के अनुसार शाम छह बजे से रात नौ बजे के बीच सबसे अधिक 1,079 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं। दोपहर तीन से शाम छह बजे के बीच 946, दोपहर 12 से तीन बजे के बीच 706 और सुबह नौ से दोपहर 12 बजे के बीच 658 दुर्घटनाएं हुईं।

इससे शाम और रात के शुरुआती घंटों में यातायात प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट, सड़क संकेत और वाहन चालकों की गति पर नियंत्रण की जरूरत सामने आती है।

हादसे के बाद पहला घंटा बेहद महत्वपूर्ण

सड़क दुर्घटना के बाद घायल को कितनी जल्दी चिकित्सा सुविधा मिलती है, इसका उसकी जान बचने से सीधा संबंध है। ब्लैक स्पॉट और दुर्घटना संभावित क्षेत्रों के आसपास एंबुलेंस की उपलब्धता बढ़ाने, प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करने और अस्पतालों में ट्रॉमा केयर मजबूत करने की जरूरत है।

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार दुर्घटना रोकने के साथ-साथ दुर्घटना के बाद बचाव व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है। कई मामलों में गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचने से उसकी स्थिति और खराब हो सकती है।

सिर्फ चालान से नहीं रुकेगी मौत

सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए हेलमेट और सीट बेल्ट की जांच तथा चालान जरूरी हैं, लेकिन केवल प्रवर्तन से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। दुर्घटना संभावित स्थानों की वैज्ञानिक पहचान, सड़क इंजीनियरिंग में सुधार, स्पीड लिमिट का प्रभावी पालन, स्पीड कैमरे, शराब जांच, भारी वाहनों की निगरानी, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ते, ब्लैक स्पॉट का स्थायी सुधार और बेहतर आपात चिकित्सा व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा।

राज्य में सड़क दुर्घटनाओं के विश्लेषण के लिए Integrated Road Accident Database यानी iRAD जैसी व्यवस्था भी है। इसका उद्देश्य दुर्घटनाओं से जुड़े आंकड़ों को एकीकृत कर उनके आधार पर सड़क सुरक्षा की योजनाएं तैयार करना है।

आंकड़े दे रहे गंभीर चेतावनी

जनवरी से जून 2026 के 3,078 हादसे और 2,478 मौतें केवल छह महीने का आंकड़ा हैं। दूसरी ओर वर्ष 2021 से 2024 तक लगातार मौतों का आंकड़ा हजारों में रहा और वर्ष 2025 में नवंबर तक ही 4,111 लोगों की मौत दर्ज की गई।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि झारखंड में सड़क दुर्घटनाएं केवल यातायात व्यवस्था की समस्या नहीं रह गई हैं, बल्कि हजारों परिवारों को प्रभावित करने वाला गंभीर सामाजिक और मानवीय संकट बन चुकी हैं।

हालांकि अलग-अलग वर्षों और अलग-अलग अवधि के आंकड़ों को मिलाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि 2025 और 2026 के आंकड़े अंतरिम अवधि के हैं। इसलिए इन्हें पूर्ण वर्ष का अंतिम सरकारी आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। 2026 के पूरे वर्ष का आधिकारिक आंकड़ा जारी होने के बाद ही वास्तविक वार्षिक स्थिति की अंतिम तस्वीर सामने आएगी।

सड़क सुरक्षा के लिए पुलिस, परिवहन विभाग, स्वास्थ्य विभाग, सड़क निर्माण एजेंसियों और जिला प्रशासन को संयुक्त रूप से काम करना होगा। तेज रफ्तार पर नियंत्रण, हेलमेट और सीट बेल्ट का अनिवार्य पालन, ब्लैक स्पॉट का सुधार, सुरक्षित सड़क डिजाइन और दुर्घटना के बाद तत्काल चिकित्सा सुविधा ही मौतों के इस सिलसिले को कम करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

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