जमशेदपुर। शहर में रविवार की संध्या 7:30 बजे भगवान के पूजन और कलश स्थापना के साथ रामलीला का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर भक्ति संगीत के बीच नारद मोह प्रसंग का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से श्रद्धालुओं को भगवान की लीला, भक्ति की महिमा और अहंकार के परिणामों से परिचित कराया। रामलीला के इस प्रसंग में दिखाया गया कि ज्ञान, तपस्या और साधना के बावजूद मनुष्य को कभी अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि अहंकार व्यक्ति के विवेक को नष्ट कर सकता है।
कथा के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद गहन तपस्या में लीन थे। उनकी तपस्या से इंद्र को अपना सिंहासन खतरे में दिखाई देने लगा। उन्होंने नारद की तपस्या भंग करने के उद्देश्य से कामदेव को भेजा। हालांकि, कामदेव अपने प्रयास में सफल नहीं हो सके। नारद ने अपनी तपस्या और संयम बनाए रखा तथा कामदेव के प्रति क्रोध करने के बजाय उन्हें क्षमा कर दिया। इस घटना के बाद नारद के मन में यह विचार उत्पन्न हो गया कि उन्होंने काम, क्रोध और मोह पर विजय प्राप्त कर ली है। धीरे-धीरे यही विचार उनके भीतर अहंकार का रूप लेने लगा।
नारद ने अपनी उपलब्धि का वर्णन पहले ब्रह्मा जी के समक्ष किया। ब्रह्मा जी ने उन्हें इस बात का प्रचार नहीं करने की सलाह दी। इसके बावजूद नारद भगवान शिव के पास पहुंचे और उन्हें भी अपनी तपस्या की सफलता के बारे में बताया। भगवान शिव ने भी उन्हें अहंकार से बचने की सीख दी, लेकिन नारद इसके बाद भगवान विष्णु के पास पहुंचे।
भगवान विष्णु समझ गए कि नारद के मन में अपनी साधना को लेकर अभिमान पैदा हो गया है। उनके अहंकार को दूर करने के लिए भगवान ने अपनी माया रची। मार्ग में नारद ने एक अत्यंत सुंदर नगर देखा, जहां राजा की पुत्री विश्वमोहिनी के स्वयंवर की तैयारी हो रही थी। राजकुमारी के सौंदर्य से आकर्षित होकर नारद भी उससे विवाह करने की इच्छा रखने लगे। उन्होंने स्वयंवर में सुंदर रूप पाने के लिए भगवान विष्णु से सहायता मांगी। भगवान ने उन्हें ऐसा रूप दिया, जिसके कारण स्वयंवर में उनका उपहास हुआ।
इस घटना से क्रोधित नारद ने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया कि जिस प्रकार उन्हें स्त्री के कारण वियोग का दुख सहना पड़ा है, उसी प्रकार भगवान को भी पत्नी-वियोग सहना पड़ेगा। रामायण की मान्यता के अनुसार, यही श्राप आगे चलकर भगवान राम के जीवन में सीता-वियोग के प्रसंग से जुड़ता है। वानर रूप से संबंधित प्रसंग को भी इसी कथा से जोड़ा जाता है, जो आगे चलकर भगवान राम की सहायता करने वाले वानर समुदाय की भूमिका का संकेत देता है।
नारद मोह प्रसंग का मुख्य संदेश यही है कि सच्ची साधना का उद्देश्य केवल शक्ति या सिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि मन से अहंकार को समाप्त करना है। ज्ञान और भक्ति तभी सार्थक होते हैं, जब व्यक्ति विनम्रता और विवेक को अपने जीवन में स्थान देता है।

