Breaking
Mon. Oct 5th, 2026

*शहीद बाजी राउत : 12 वर्ष की उम्र में मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान*

जमशेदपुर।भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े नेताओं, आंदोलनों और युद्धों का इतिहास नहीं है। यह उन असंख्य सामान्य परिवारों के असाधारण साहस की गाथा भी है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन्हीं अमर बलिदानियों में ओडिशा के वीर बालक शहीद बाजी राउत का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। महज 12 वर्ष की आयु में मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले बाजी राउत भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बाल साहस और देशभक्ति के प्रतीक बन गए।बाजी राउत का जन्म ओडिशा के ढेंकानाल क्षेत्र में हुआ था। उनका परिवार सामान्य ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़ा था। कम उम्र में ही उन्होंने देश में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन और अंग्रेजी शासन के विरोध का प्रभाव देखा। उस दौर में ओडिशा की रियासतों में भी प्रजा पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध और अत्याचार की शिकायतें थीं। ढेंकानाल में राजशाही के विरुद्ध जन असंतोष बढ़ रहा था और प्रजामंडल आंदोलन के माध्यम से लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे थे।

इसी वातावरण में बालक बाजी राउत भी आंदोलन से जुड़े। वे बनर सेना के सदस्य के रूप में संदेश पहुंचाने और आंदोलनकारियों की सहायता करने जैसे कार्य करते थे। उम्र भले ही छोटी थी, लेकिन देश और समाज के प्रति उनका दायित्व-बोध असाधारण था।
वर्ष 1938 में ढेंकानाल क्षेत्र में आंदोलन तेज हो गया। ब्रिटिश समर्थित शासन-व्यवस्था के विरुद्ध लोगों का विरोध बढ़ता जा रहा था। इसी क्रम में पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनी। 11 अक्टूबर 1938 की रात नीलकंठपुर घाट के पास पुलिसकर्मियों ने ब्राह्मणी नदी पार करने के लिए नाव मांगी। उस समय बाजी राउत नाव की रखवाली कर रहे थे।बताया जाता है कि बाजी राउत ने पुलिस को नदी पार कराने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने कर्तव्य से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। पुलिस के दबाव और धमकी के बावजूद उन्होंने नाव चलाने से इनकार कर दिया। इसके बाद पुलिस ने उन पर गोली चला दी। इस निर्मम गोलीबारी में 12 वर्षीय बाजी राउत शहीद हो गए। उनके साथ कुछ अन्य लोगों की भी जान गई।

एक छोटे से बालक का यह बलिदान पूरे ओडिशा में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरणा बन गया। बाजी राउत की शहादत ने यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता की भावना उम्र की मोहताज नहीं होती। जिस उम्र में बच्चे सामान्यतः खेल और पढ़ाई में अपना समय बिताते हैं, उस उम्र में बाजी राउत ने अन्याय के सामने झुकने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देना स्वीकार किया।बाजी राउत का बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस दौर के जनआंदोलन की शक्ति और व्यापकता का प्रमाण भी है। उनका जीवन बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन गांवों और कस्बों तक पहुंच चुका था और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग उसमें अपनी भूमिका निभा रहे थे। बच्चों और युवाओं ने भी अपने स्तर पर आंदोलन को सहयोग दिया।ओडिशा की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना में भी बाजी राउत की शहादत का विशेष स्थान है। उनकी वीरगाथा ने कवियों और लेखकों को प्रभावित किया। बाद के वर्षों में उनकी स्मृति स्वतंत्रता, साहस और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में स्थापित हुई। आज भी उनका नाम नई पीढ़ी को यह प्रेरणा देता है कि अन्याय और अत्याचार के सामने खड़े होने के लिए केवल उम्र नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प आवश्यक है।शहीद बाजी राउत की जयंती केवल एक बाल शहीद को याद करने का अवसर नहीं है। यह उस पीढ़ी को स्मरण करने का दिन भी है जिसने स्वतंत्रता को केवल एक राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि अपने सम्मान और अधिकार का प्रश्न माना। उनका जीवन हमें बताता है कि राष्ट्रभक्ति केवल नारों में नहीं, बल्कि कर्तव्य, साहस और त्याग में दिखाई देती है।

आज जब देश स्वतंत्रता के दशकों बाद विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है, तब बाजी राउत जैसे वीरों का स्मरण हमारी जिम्मेदारियों को भी याद दिलाता है। स्वतंत्रता हमें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुई; इसके पीछे असंख्य ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों का त्याग है। 12 वर्ष के बालक बाजी राउत ने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान देकर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया।

जयंती के अवसर पर ऐसे अमर बाल शहीद को विनम्र श्रद्धांजलि देना केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके साहस और बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी है। शहीद बाजी राउत की अमर गाथा सदैव देशभक्ति, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देती रहेगी।

 

वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

*

Related Post