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*हो भाषा, शिक्षा-संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण पर कवियों ने रखे विचार*

चाईबासा: हो हयम मरसल अकड़ा के तत्वावधान में टाटा कॉलेज स्थित बिरसा मेमोरियल हॉल में दुड़ु-जुमुर (कवि सम्मेलन) का आयोजन किया गया। सम्मेलन में उदीयमान कवि-कवयित्रियों ने हो भाषा में एक से बढ़कर एक कविताओं की प्रस्तुति दी। कविताओं के माध्यम से भाषा, शिक्षा एवं संस्कृति के विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। वहीं कई कवियों ने हास्य और प्रेम रस की कविताएं प्रस्तुत कर श्रोताओं का मनोरंजन किया।

कार्यक्रम में शिक्षक मंगल सिंह मुंडा की कविता ‘कोवालु चेतन लांडा-लुंडु’ तथा रमेशचंद्र सावैयां की ‘सय-सयते नेलिञ गेया तोरङ’ प्रमुख रही। वहीं कवि श्याम कुदादा ने विस्थापन पर आधारित ‘अबु दिशुम’ शीर्षक कविता की भावपूर्ण प्रस्तुति दी।

मौके पर कोल्हान एजुकेशनल एंड चैरिटेबल सोसायटी के अध्यक्ष चंद्रमोहन बिरुवा, पूर्व उपसमाहर्ता विजय लक्ष्मी सिंकू, खान मंत्रालय के पूर्व उपनिदेशक सिंगा तियू, अधिवक्ता रमेश जेराई और केएनटी के अध्यक्ष तुरी सुंडी ने संबोधित किया। वक्ताओं ने कहा कि ‘हो’ भाषा में आध्यात्मिकता है। इस भाषा को बोलने वाले लोग संवेदनशील और भावुक होते हैं। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभाषा के साथ अन्य भाषाओं की जानकारी रखना भी जरूरी है, जिससे विभिन्न विषयों को समझने में तुलनात्मक दृष्टिकोण विकसित हो सके।

दुड़ु-जुमुर में बेहतर कविता प्रस्तुति के लिए कोमचोंग बागे को पांच हजार रुपये, घनश्याम सामड को तीन हजार रुपये और श्याम कुदादा को दो हजार रुपये पुरस्कार राशि प्रदान की गई।

कविता प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में साहित्यकार तिलक बारी, सोनू हेस्सा, बागुन बोदरा, सहायक प्राध्यापक दिलदार पुरती, हो राइटर्स एसोसिएशन के कृष्णा देवगम और बिरसिंह बिरुली शामिल थे।

कार्यक्रम में बीडीओ साधुचरण देवगम, सुशील कुमार पुरती, सतीश सामड, सुखलाल पुरती, तुरी सुंडी, सिकंदर बुड़ीउली, रामय पुरती, रामसिंह पुरती, गोबई गागराई, सारिका पुरती सुंडी, अनीता कुदादा बिरुवा, राजेन्द्र बिरुवा, डॉ. दुलमु बुड़ीउली और सुखमती बारी सहित अन्य लोग उपस्थित थे। मंच संचालन जगन्नाथ हेस्सा ने किया।

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