चाईबासा: हो भाषा और वारंग क्षिति लिपि के विकास को लेकर कोल्हान के तीनों जिलों के मानकी, मुंडा, साहित्यकार और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक स्थानीय मानकी-मुंडा विश्रामागार में हुई। बैठक का आयोजन मानकी मुंडा संघ के तत्वावधान में किया गया। अध्यक्षता संघ के केंद्रीय अध्यक्ष गणेश पाट पिंगुवा ने की।
बैठक में हो भाषा और वारंग क्षिति लिपि के विकास सहित भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग को लेकर चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि हो भाषा का उपयोग झारखंड के अलावा ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित अन्य क्षेत्रों में भी होता है। इसके बावजूद हो भाषा अभी तक संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है।
हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली ने कहा कि हो भाषा बोलने वालों की संख्या अच्छी-खासी है। उन्होंने कहा कि 30 अगस्त 2011 को झारखंड में हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया, लेकिन प्राथमिक विद्यालयों में अब तक हो भाषा की पढ़ाई शुरू नहीं की गई है। उन्होंने विद्यालयों में हो भाषा की पढ़ाई शुरू करने की जरूरत बताई।
उन्होंने वारंग क्षिति लिपि को लेकर कहा कि इस लिपि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल रही है। अमेरिकन शोधार्थी अन्नाकूची लोवास्की और माइकल एवर्सन के सहयोग से वारंग क्षिति लिपि को अंतरराष्ट्रीय मानक प्रणाली यूनिकोड में शामिल किया गया है। अब यूनिकोड में वारंग क्षिति लिपि का अपना कोड उपलब्ध है। उन्होंने बताया कि इसका 7.0 वर्जन है।
बैठक में निर्णय लिया गया कि गांवों के नाम वारंग क्षिति लिपि में लिखे जाएंगे। इसके लिए संबंधित ग्रामसभा की सहमति ली जाएगी और उसकी सहमति के बाद गांवों में वारंग क्षिति लिपि में साइन बोर्ड लगाए जाएंगे। बैठक में इस पहल को हो भाषा और लिपि के प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।
बैठक में संघ के उपाध्यक्ष कालीचरण बिरुवा, महासचिव चंदन होनहागा, आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा कार्य समिति झारखंड के पूर्वी जिला संयोजक काशराय कुदादा समेत अन्य प्रतिनिधि मौजूद थे।

