जमशेदपुर।9 सितंबर 1893 को कानपुर के नरवल गांव में जन्मे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक ऐसे कवि के रूप में दर्ज है, जिनकी रचना ने देशभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका प्रसिद्ध झंडा गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा’ आज भी राष्ट्रीय गौरव और देशप्रेम की भावना से जुड़ा हुआ है।
श्यामलाल गुप्त का जन्म विशेश्वर प्रसाद और कौशल्या देवी के परिवार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद परिवार की इच्छा थी कि वे घरेलू व्यवसाय संभालें, लेकिन उनका मन पढ़ाई और साहित्य में अधिक रमता था। इसी रुचि के चलते उन्होंने विद्यालय में शिक्षक के रूप में काम किया। नौकरी की कुछ शर्तों को अपनी स्वतंत्रता के विपरीत मानते हुए उन्होंने शिक्षक पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में उन्होंने ‘सचिव’ नाम से मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, जिसमें राष्ट्रीय चेतना और देश की स्वतंत्रता का संदेश प्रमुखता से सामने आता था।
साहित्य के प्रति उनका आकर्षण बचपन से ही था। किशोरावस्था में उन्होंने रामायण के बालकांड को विभिन्न छंदों में लिखने का प्रयास किया था। हालांकि परिवार में फैली एक अंधविश्वासी धारणा के कारण उनकी पांडुलिपि नष्ट कर दी गई। इस घटना से वे इतने व्यथित हुए कि अयोध्या चले गए और वहां आध्यात्मिक जीवन अपनाने का प्रयास किया। बाद में परिजनों के आग्रह पर वे वापस लौटे और अपनी साहित्यिक यात्रा को आगे बढ़ाया।
उनके जीवन में गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का साथ निर्णायक साबित हुआ। एक कार्यक्रम में उनकी कविता सुनने के बाद विद्यार्थी उनके लेखन से प्रभावित हुए। दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध बना और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े कार्यों में भी पार्षद की सक्रियता बढ़ती गई।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के पास अपना ध्वज था, लेकिन उसके साथ गाए जाने वाले किसी प्रभावशाली गीत की कमी महसूस की जा रही थी। गणेश शंकर विद्यार्थी ने श्यामलाल गुप्त से इस उद्देश्य के लिए गीत लिखने का अनुरोध किया। लगातार प्रयास के बाद 3-4 मार्च 1924 की रात उन्होंने वह गीत रचा, जिसकी पंक्तियां बाद में स्वतंत्रता संघर्ष की पहचान बन गईं।
‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।’
13 अप्रैल 1924 को जलियांवाला बाग हत्याकांड की स्मृति में कानपुर के फूलबाग में आयोजित कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में इस गीत का सार्वजनिक गायन हुआ। इसके बाद यह रचना देशभर में तेजी से लोकप्रिय हुई और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच उत्साह एवं राष्ट्रभक्ति का संचार करने लगी।
1938 में हरिपुरा में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू समेत कई प्रमुख नेताओं ने भी इस गीत को गाया। अपने गीत को राष्ट्रीय आंदोलन के शीर्ष नेताओं की आवाज में सुनना पार्षद के लिए बेहद भावुक क्षण था।
श्यामलाल गुप्त केवल रचनाकार नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सेनानी भी थे। उन्होंने असहयोग आंदोलन और नमक आंदोलन में भाग लिया तथा जेल की यातना भी झेली। वर्ष 1921 में उन्होंने देश को स्वराज मिलने तक नंगे पांव रहने का संकल्प लिया था और उसे लंबे समय तक निभाया।
आजादी के बाद देश की राजनीतिक परिस्थितियों में आए बदलाव से वे संतुष्ट नहीं थे। राजनीति में बढ़ते स्वार्थ और सत्ता केंद्रित सोच पर उन्होंने व्यंग्य भी किया। उनके एक व्यंग्यात्मक कथन में पुराने झंडा गीत की पंक्तियों को बदलकर सत्ता की राजनीति पर टिप्पणी की गई थी। इससे स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक माहौल को लेकर उनके भीतर की निराशा स्पष्ट होती थी।
अपने जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने नरवल गांव में ‘गणेश सेवा आश्रम’ की स्थापना की। वे नियमित रूप से पैदल आश्रम जाया करते थे। इसी दौरान पैर में कांच लगने के बाद पर्याप्त उपचार नहीं मिल सका और चोट गंभीर संक्रमण में बदल गई। बाद में गैंगरीन के कारण 10 अगस्त 1977 को उनका निधन हो गया।
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की साहित्यिक विरासत आज भी जीवंत है। उन्होंने अपनी कविता को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि उसे स्वतंत्रता और राष्ट्र जागरण का हथियार बनाया। उनका झंडा गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों के साथ आज भी तिरंगे के सम्मान और देशभक्ति की भावना को मजबूती से व्यक्त करता है।
वरुण कुमार
लेखक एवं कवि

