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धोरोम सेनेलेद् 2026 में पारंपरिक धर्म-संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था को बचाने पर ज़ोर

जमशेदपुर: दिशोम जाहेरथान, करनडीह जमशेदपुर में रविवार को माझी परगना माहाल पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था धाड़ कुचूं बारहा पातकोम सिञ दिशोम, कोल्हान प्रमंडल के संयुक्त नेतृत्व में धोरोम सेनेलेद् 2026 का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पांच दिशोम परगना बाबाओं ने संयुक्त रूप से की। सम्मेलन में संथाल समाज की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था, रीति-रिवाज, पूजा पद्धति, न्याय प्रणाली और सामाजिक जीवन से जुड़े विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।

धोरोम सेनेलेद् में धर्म प्रचारक एवं कथावाचक दुर्गा प्रसाद मुर्मू ने संथाल समाज की पारंपरिक व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पूर्वजों ने समाज को अनुशासित और मर्यादित जीवन पद्धति से जोड़ने के उद्देश्य से मारांग बुरु के सानिध्य में लुगु बाबा के नेतृत्व में लंबे विचार-विमर्श के बाद माझी-परगना व्यवस्था स्थापित की थी। उन्होंने जन्म से लेकर मृत्यु तक होने वाले सामाजिक और धार्मिक क्रियाकलापों की भी व्याख्या की।

सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में समाज के लोग अपनी पारंपरिक व्यवस्था, धर्म, संस्कृति, पूजा पद्धति और न्याय प्रणाली से लगातार दूर होते जा रहे हैं, जो चिंता का विषय है। धर्म सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य समाज को पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था से जोड़े रखना और नई पीढ़ी को धार्मिक मान्यताओं एवं पारंपरिक क्रियाकलापों से परिचित कराना है।

कार्यक्रम में धार्मिक आस्था को बनाए रखने, पारंपरिक धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण तथा धर्मांतरण के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि समाज सभी धर्मों का सम्मान करता है, लेकिन आदिवासी समाज को धर्म के नाम पर बांटने या धर्मांतरण के लिए प्रभावित करने की कोशिशों के प्रति लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है।

सम्मेलन में मारांग बुरु, लुगु बुरु, आजोदिया बुरु, जांग बाहा तुपुनाई घाट और राजरप्पा समेत पारंपरिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों को सुरक्षित और संरक्षित रखने पर भी जोर दिया गया।

सम्मेलन में लिए गए कई महत्वपूर्ण निर्णय

धोरोम सेनेलेद् 2026 में समाज की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई निर्णय लिए गए। इनमें धर्मांतरण से दूर रहने, पारंपरिक पूजा पद्धति और धार्मिक क्रियान्वयन में नियमित रूप से उपस्थिति दर्ज कराने तथा अंतर्जातीय विवाह नहीं करने का निर्णय शामिल है।

इसके अलावा समाज में नशे की प्रवृत्ति को छोड़कर शिक्षा पर विशेष ध्यान देने, प्रत्येक घर में पारंपरिक औजार के रूप में तीर-धनुष रखने और ओल चिकी लिपि को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने पर सहमति बनी।

सम्मेलन में आगामी आम जनगणना में धर्म के कॉलम में आदिवासी धर्म के स्थान पर सारना धर्म लिखने का आह्वान भी किया गया।

कार्यक्रम में समाज के हजारों लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा में हिस्सा लिया। इस दौरान लोगों ने पारंपरिक धार्मिक पद्धति, विधि-विधान और सामाजिक व्यवस्था से संबंधित जानकारी हासिल की।

मौके पर देश पारगना बाबा बैजू मुर्मू, देश पारगना पिथो मार्डी, देश पारगना कमलाकांत मुर्मू, देश पारगना फाकिर मोहन टुडू, तोरोप पारगना दसमत हांसदा, मानिक चंद्र मुर्मू, सुशील हांसदा, सोनातन हांसदा, कुंआर मुर्मू, सुशील मुर्मू, बैजू टुडू, चंद्राय हांसदा, पुन्ता मुर्मू, पद्मावती हेंम्ब्रोम, राजाराम हांसदा, सुन्दर मोहन हेंम्ब्रोम, देश पारानिक बाबा दुर्गा चरन मुर्मू, देश पारानिक बाबा नवीन मुर्मू, माझी बाबा बिंदे सोरेन, सुनिल सोरेन, भुगलू सोरेन, नाथो टुडू, पोरेश हांसदा, बुद्धेश्वर किस्कू, शंकर हेंम्ब्रोम, गोपाल हांसदा समेत बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद रहे।

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