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आत्मचिंतन के बिना जीवन अधूरा, साधना और सत्संग से ही आत्मज्ञान की प्राप्ति : विज्ञान देव जी महाराज

जमशेदपुर। नरभे राम हंसराज स्कूल ऑडिटोरियम में विहंगम योग के प्रवर संत विज्ञान देव जी महाराज ने आध्यात्मिक प्रवचन के दौरान जीवन के वास्तविक उद्देश्य और आत्मज्ञान की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन करते हुए सवाल किया कि आखिर मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है और मुझे जाना कहां है।

विज्ञान देव जी महाराज ने कहा कि जो शाश्वत और नित्य है, वही आत्मा है, लेकिन मनुष्य का ध्यान प्रायः बाहरी संसार और उसके दृश्यों तक ही सीमित रहता है। हमारी पांच ज्ञानेंद्रियां भी अपने-अपने विषयों के माध्यम से लगातार बाहरी दुनिया से जुड़ी रहती हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि नश्वर शरीर का आधार क्या है और इस जड़ शरीर को चेतना प्रदान करने वाली सत्ता कौन सी है। उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों का उत्तर बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि अंतर की यात्रा में मिलता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य स्वयं को सनातन और नित्य मानता है, लेकिन वास्तव में वह अपने अस्तित्व को कितना जानता है, इस पर विचार करना आवश्यक है। सामाजिक जीवन, व्यवसाय और रोजगार से जुड़ा ज्ञान जरूरी है, लेकिन इसके साथ आत्मकल्याण के लिए आध्यात्मिक चिंतन भी होना चाहिए। केवल भौतिक सुख और भोग की ओर बढ़ते रहने से जीवन की वास्तविक सार्थकता प्राप्त नहीं हो सकती।

संत प्रवर ने कहा कि जीव विभिन्न शरीरों में भटकता रहता है और मनुष्य के लिए यह समझना आवश्यक है कि जीवन का वास्तविक सत्य क्या है। शरीर में स्थित प्राणों का भी जो प्राण है, वही परम सत्ता है। आत्मा में स्थित वही परमात्मा जीवन का आधार है और उसका स्वरूप आनंदमय है। उन्होंने कहा कि मनुष्य शांति चाहता है और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयास करता है, लेकिन आत्मज्ञान के प्रति सजग नहीं रहता।

विज्ञान देव जी महाराज ने कहा कि जीवन कर्मों के निरंतर प्रवाह में आगे बढ़ता रहता है और कर्मों का प्रतिफल भी मनुष्य के सामने आता रहता है। इस कर्मचक्र से मुक्त होने के लिए आत्मज्ञान और आध्यात्मिक जागरूकता आवश्यक है। ऋषियों ने भी आत्मज्ञान को जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य बताया है। उन्होंने श्रद्धालुओं से साधना और योग के मार्ग पर चलने तथा नियमित सत्संग के माध्यम से अपने भीतर की यात्रा शुरू करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बाहरी उपलब्धियों के साथ यदि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करे, तभी उसका जीवन सही अर्थों में सार्थक हो सकता है।

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