जमशेदपुर।महापराक्रमी, रणधुरंधर, अपराजित योद्धा और महान सेनानायक श्रीमंत थोरले बाजीराव पेशवे को जयंती पर विनम्र अभिवादन!भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक वीर योद्धा हुए हैं, जिन्होंने अपने अदम्य साहस, असाधारण युद्धकौशल और राष्ट्रनिष्ठा से इतिहास की दिशा बदल दी। मराठा साम्राज्य के इतिहास में श्रीमंत थोरले बाजीराव पेशवे का नाम ऐसे ही महान सेनानायकों में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल एक कुशल प्रशासक या पेशवा नहीं थे, बल्कि रणभूमि की परिस्थितियों को समझने वाले अद्वितीय रणनीतिकार थे।
बाजीराव का जन्म 18 अगस्त 1700 को हुआ था। उनके पिता बाळाजी विश्वनाथ भट छत्रपति शाहू महाराज के प्रथम पेशवा थे। ऐसे परिवार में जन्म लेने के कारण बाजीराव को बचपन से ही राजनीति, प्रशासन, कूटनीति और युद्धनीति का अनुभव प्राप्त हुआ। पिता के निधन के बाद मात्र लगभग 19 वर्ष की आयु में छत्रपति शाहू महाराज ने उन्हें पेशवा नियुक्त किया।इतनी कम उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलना अपने आप में असाधारण था। उस समय मराठा साम्राज्य के सामने अनेक राजनीतिक और सैन्य चुनौतियां थीं। मुगल सत्ता कमजोर हो रही थी, लेकिन उसका प्रभाव अभी समाप्त नहीं हुआ था। दक्षिण में निजाम की शक्ति बढ़ रही थी और विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियां अपने प्रभाव का विस्तार करने में लगी थीं। ऐसे समय में बाजीराव ने मराठा साम्राज्य के लिए व्यापक रणनीति तैयार की।छत्रपति शिवाजी महाराज की स्वराज्य संकल्पना को विस्तार
बाजीराव के मन में छत्रपति शिवाजी महाराज की स्वराज्य की संकल्पना के प्रति गहरा सम्मान था। शिवाजी महाराज ने जिस स्वराज्य की नींव रखी थी, बाजीराव ने उसे व्यापक राजनीतिक और सैन्य प्रभाव में बदलने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य केवल किसी एक क्षेत्र पर विजय प्राप्त करना नहीं था, बल्कि मराठा शक्ति को पूरे भारत में प्रभावशाली बनाना था।
उन्होंने अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों को समझते हुए तेज गति से सैन्य अभियान चलाए। उनकी सेना की सबसे बड़ी विशेषता थी—गति, अनुशासन, रणनीति और अचानक आक्रमण की क्षमता। वे भारी-भरकम सैन्य तामझाम के बजाय तेज गति से चलने वाली घुड़सवार सेना पर अधिक भरोसा करते थे।बाजीराव की सैन्य प्रतिभा का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 1728 का पालखेड अभियान माना जाता है। निजाम-उल-मुल्क की सेना के मुकाबले मराठा सेना संख्या और संसाधनों की दृष्टि से अलग परिस्थितियों में थी, लेकिन बाजीराव ने सीधे टकराव के बजाय अपनी गति और रणनीति का इस्तेमाल किया।
उन्होंने निजाम की सेना की रसद और आवागमन की व्यवस्था को प्रभावित किया तथा उसे ऐसी स्थिति में पहुंचाया जहां उसके लिए आगे बढ़ना कठिन हो गया। अंततः निजाम को समझौता करना पड़ा। पालखेड की विजय ने यह सिद्ध कर दिया कि युद्ध केवल हथियारों और सैनिकों की संख्या से नहीं, बल्कि रणनीति, गति और सही समय पर लिए गए निर्णयों से भी जीता जाता है।
बाजीराव के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना बुंदेलखंड से जुड़ी है। बुंदेला शासक महाराजा छत्रसाल ने मुगल दबाव के विरुद्ध बाजीराव से सहायता मांगी। बाजीराव ने उनकी सहायता के लिए अभियान चलाया और मुगल शक्ति को चुनौती दी।
इस अभियान ने बुंदेलखंड में मराठा प्रभाव को मजबूत किया। छत्रसाल ने बाजीराव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की और दोनों के बीच राजनीतिक एवं सैन्य संबंध मजबूत हुए। बुंदेलखंड अभियान बाजीराव की दूरदर्शिता का उदाहरण था, क्योंकि उन्होंने स्थानीय शक्तियों के साथ सहयोग स्थापित कर मराठा प्रभाव को और विस्तृत किया।बाजीराव की सबसे साहसिक सैन्य कार्रवाइयों में 1737 में दिल्ली की ओर किया गया तेज अभियान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मुगल साम्राज्य की राजधानी दिल्ली तक मराठा सेना की तेज पहुंच ने तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था को गहरा संदेश दिया।बाजीराव का उद्देश्य केवल राजधानी पर स्थायी कब्जा करना नहीं था, बल्कि मुगल सत्ता को यह दिखाना था कि मराठा शक्ति अब केवल महाराष्ट्र या दख्खन तक सीमित नहीं रही। उनकी तेज गति और रणनीतिक कौशल के कारण मुगल दरबार में चिंता उत्पन्न हुई। इसके बाद 1738 में भोपाल के अभियान में भी बाजीराव की रणनीति ने मराठों को महत्वपूर्ण सफलता दिलाई।
*“गनिमी कावा” की परंपरा का प्रभावी उपयोग*
मराठा युद्धशैली की एक महत्वपूर्ण विशेषता गनिमी कावा थी। शत्रु की शक्ति से सीधे टकराने के बजाय उसकी कमजोरियों का लाभ उठाना, अचानक दिशा बदलना, तेज गति से आगे बढ़ना और रसद व्यवस्था पर दबाव डालना इस युद्धशैली के प्रमुख तत्व थे।बाजीराव ने इन सिद्धांतों को व्यापक स्तर पर लागू किया। वे शत्रु की गतिविधियों का अनुमान लगाकर अपनी सेना को तेजी से स्थानांतरित करते थे। यही कारण था कि कई बार विरोधी सेनाएं उनकी वास्तविक स्थिति और अगले कदम का अनुमान नहीं लगा पाती थीं।बाजीराव की सफलता का एक बड़ा कारण उनकी घुड़सवार सेना थी। वे मानते थे कि युद्ध में गति स्वयं एक महत्वपूर्ण हथियार है। उनकी सेना लंबी दूरी कम समय में तय कर सकती थी और आवश्यकता के अनुसार अचानक हमला या पीछे हट सकती थी।
उनकी युद्धनीति का मूल मंत्र था कि शत्रु को अपनी सुविधा के अनुसार युद्ध करने का अवसर न दिया जाए। यही कारण है कि बाजीराव ने अनेक अभियानों में अपेक्षाकृत कम समय में बड़ी राजनीतिक और सैन्य उपलब्धियां हासिल कीं।
बाजीराव केवल रणभूमि के सेनानायक नहीं थे। वे कूटनीति को भी उतना ही महत्व देते थे। उन्होंने विभिन्न राजाओं और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संबंध स्थापित किए। परिस्थितियों के अनुसार मित्रता, समझौता और सैन्य दबाव—इन सभी साधनों का उपयोग उन्होंने मराठा हितों के लिए किया।
उनका नेतृत्व सैनिकों के बीच भी अत्यंत प्रभावशाली था। वे स्वयं अभियानों का नेतृत्व करते थे और कठिन परिस्थितियों में सेना के साथ रहते थे। इससे सैनिकों में उनके प्रति विश्वास और सम्मान पैदा हुआ।
अल्पायु में असाधारण उपलब्धियां
बाजीराव का जीवन बहुत लंबा नहीं था। मात्र 39 वर्ष की आयु में 28 अप्रैल 1740 को उनका निधन हो गया। लेकिन इतने कम समय में उन्होंने जो राजनीतिक और सैन्य उपलब्धियां हासिल कीं, वे उन्हें भारतीय इतिहास के महान सेनानायकों की श्रेणी में स्थापित करती हैं।
उनके निधन के बाद भी मराठा साम्राज्य का विस्तार जारी रहा। उनके द्वारा तैयार की गई रणनीतिक दिशा और उत्तर भारत में स्थापित किया गया मराठा प्रभाव आगे आने वाले वर्षों में और मजबूत हुआ।
इतिहास में अमर स्थान
बाजीराव पेशवे का मूल्यांकन केवल युद्धों की संख्या से नहीं किया जा सकता। उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने मराठा शक्ति की कल्पना को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर निकालकर व्यापक भारतीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया।
उनकी युद्धनीति में गति थी, निर्णयों में साहस था और लक्ष्य में स्पष्टता थी। वे परिस्थितियों से घबराने के बजाय उन्हें अपने पक्ष में बदलने का प्रयास करते थे। यही कारण है कि उनका नाम आज भी सैन्य रणनीति और नेतृत्व के संदर्भ में सम्मान के साथ लिया जाता है।श्रीमंत थोरले बाजीराव पेशवे की जयंती केवल एक महान योद्धा को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि साहस, नेतृत्व, दूरदर्शिता और राष्ट्रनिष्ठा के आदर्शों को स्मरण करने का अवसर है। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा मराठा सामर्थ्य के विस्तार और स्वराज्य की संकल्पना को व्यापक बनाने में समर्पित किया।
ऐसे अद्वितीय रणनीतिकार, धाडसी सेनानायक और पराक्रमी योद्धा श्रीमंत थोरले बाजीराव पेशवे के शौर्य, पराक्रम, नेतृत्व और स्वराज्यनिष्ठा को शत-शत नमन। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, आत्मविश्वास अटूट हो और
रणनीति सटीक हो, तो असंभव दिखाई देने वाली परिस्थितियों में भी इतिहास रचा जा सकता है।
श्रीमंत थोरले बाजीराव पेशवे यांना जयंतीनिमित्त विनम्र अभिवादन!
जय भवानी! जय शिवाजी!
वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

