। झारखंड में बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाले दिनों में खर्च बढ़ने की संभावना है। झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग जल्द ही नए बिजली टैरिफ की घोषणा करने जा रहा है, जिसे लेकर पूरे राज्य में चर्चा तेज है। माना जा रहा है कि इस बार बिजली दरों में करीब 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा असर लाखों उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर पड़ेगा।
सूत्रों के मुताबिक, अगर प्रस्तावित बढ़ोतरी लागू होती है तो घरेलू उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दर वर्तमान लगभग 6.85 रुपये प्रति यूनिट से बढ़कर 7.50 से 8 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच सकती है। हालांकि अंतिम दरें आयोग की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होंगी। संभावना है कि नई दरें 1 अप्रैल 2026 से लागू कर दी जाएंगी।
दरअसल, झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड ने पहले ही बिजली दरों में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव आयोग के सामने रखा था। कंपनी ने औसतन 50 से 60 प्रतिशत तक दर बढ़ाने की मांग करते हुए घरेलू बिजली दर को 10.30 रुपये प्रति यूनिट तक करने की सिफारिश की थी। हालांकि, यह माना जा रहा है कि आयोग उपभोक्ताओं पर अचानक बड़ा बोझ डालने से बचते हुए संतुलित फैसला ले सकता है।
बिजली दरों में संभावित बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और शहरी उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। जिन परिवारों की मासिक खपत 200 यूनिट से अधिक है, उनका बिजली बिल सीधे बढ़ जाएगा। पहले जहां 1500 से 2000 रुपये का बिल आता था, वहीं अब यह बढ़कर 2000 से 2500 रुपये या उससे अधिक हो सकता है। इससे घर का बजट बिगड़ना तय है, खासकर उन परिवारों के लिए जिनकी आय सीमित है और खर्च पहले से ही बढ़े हुए हैं।
हालांकि राहत की बात यह है कि राज्य सरकार की 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने की योजना जारी रहने की संभावना है। इससे गरीब और कम खपत वाले परिवारों को सीधा फायदा मिलेगा और उन्हें बढ़ी हुई दरों का असर नहीं झेलना पड़ेगा। लेकिन जिनकी खपत इस सीमा से ज्यादा है, उन्हें हर अतिरिक्त यूनिट पर ज्यादा भुगतान करना होगा।
बिजली महंगी होने का असर सिर्फ घरेलू उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा। छोटे दुकानदार, कारोबारी और उद्योग भी इससे प्रभावित होंगे। बिजली लागत बढ़ने से उत्पादन और सेवा की लागत बढ़ेगी, जिसका असर अंततः बाजार में सामान और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। यानी अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई बढ़ने की भी आशंका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली दरों में बढ़ोतरी का फैसला ऊर्जा क्षेत्र के आर्थिक संतुलन के लिए जरूरी हो सकता है, लेकिन इससे आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ना तय है। अब सबकी नजरें आयोग की अंतिम घोषणा पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि राहत ज्यादा मिलेगी या बोझ।

