Breaking
Sat. Feb 28th, 2026

ब्रह्मप्राप्ति ही मानव जीवन का एकमात्र पथ: आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत

जमशेदपुर। शनिवार को आनन्दमार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित द्वितीय संभागीय सेमिनार में वरिष्ठ आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य ब्रह्मप्राप्ति है और उसी की ओर अग्रसर होना ही सच्चा आध्यात्मिक पथ है। उन्होंने कहा कि मत अनेक हो सकते हैं, किंतु पथ एक ही है। यह धारणा कि जितने मत उतने पथ होते हैं, आध्यात्मिक दृष्टि से उचित नहीं है।

आचार्य सिद्धविद्यानंद ने साधना के तीन स्तर—शाक्त, वैष्णव और शैव—की व्याख्या करते हुए बताया कि तीनों का पारमार्थिक महत्व समान है। शाक्त स्तर में साधक जैव भाव से शिव भाव की ओर बढ़ता है, जहां कर्म और भोग की प्रधानता रहती है। वैष्णव स्तर में निःस्वार्थ भक्ति का विकास होता है और साधक कर्म व भक्ति के समन्वय से आगे बढ़ता है। शैव स्तर ज्ञानस्वरूपता की अवस्था है, जहां साधक ब्रह्मस्वरूपता का अनुभव करता है।

उन्होंने प्रत्याहार साधना के चार चरण—यतमान, व्यतिरेक, एकेन्द्रिय और वशीकार—का भी विस्तार से उल्लेख किया। उनके अनुसार वशीकार अवस्था में साधक का मन आत्मा के पूर्ण नियंत्रण में आ जाता है और अस्तित्व महत् तत्व की ओर उन्मुख हो जाता है। यही वह अवस्था है, जहां जीवभाव का ईश्वरभाव में रूपांतरण संभव होता है।

आचार्य ने कहा कि देश, काल और पात्र के अनुसार मत बदल सकते हैं, लेकिन परमगति की ओर बढ़ना ही आनन्दमार्ग का मूल संदेश है। सेमिनार में बड़ी संख्या में मार्गी बंधु-भगिनी उपस्थित रहे।

Related Post