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चंचल की चंचलता ने सूबे में बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मी

जमशेदपुर:झारखंड की राजनीति में इस समय “च” शब्द के दो नाम सभी की ज़ुबान पर हैं: एक, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन, और दूसरा, चंचल गोस्वामी। ये दोनों नाम सूबे की सियासत का प्रमुख बिंदु बने हुए हैं।झारखंड  पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के इस फैसले ने सबकी ज़ुबान पर चर्चा छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर लोगों  का कहना है कि इस निर्णय के पीछे चंचल की चंचलता  छिपी है। इन शब्दों का क्या मतलब है, और ये सूबे की राजनीति में प्रमुख चर्चा का विषय क्यों बने हुए हैं, यह समझना जरूरी है।

कौन हैं चंचल गोस्वामी? दरअसल, झारखंड के ब्यूरोक्रेट्स में छह महीने पहले एक नया नाम उभरकर सामने आया, जब चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया गया। चंपई सोरेन ने चंचल गोस्वामी को अपने प्रेस सलाहकार के रूप में नियुक्त किया। इसके बाद, चंचल ने राज्य की ब्यूरोक्रेसी में अपनी मजबूत पकड़ बना ली, जिससे स्वाभाविक रूप से पूर्व प्रेस सलाहकार की लॉबी में असंतोष बढ़ने लगा। चंचल गोस्वामी की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी भी अफसर की रातों रात जगह बदल दी जाती थी।

चंपई सोरेन ने रविवार को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) पार्टी छोड़ दी,और अब तक किसी भी पार्टी में जॉइन नहीं किया है।इसके पीछे पार्टी के भीतर आंतरिक मतभेद या नेतृत्व के साथ असहमति एक प्रमुख कारण निकलकर सामने आया है।

चंपाई का इशारा किसकी और?

अब सवाल है कि रविवार को चंपाई  ने  एक्स पर उधर कहकर किसकी तरफ इशारा किया है. आखिर चंपाई सोरेन ने किसके लिए लिखा है कि “अपनों द्वारा दिए गए दर्द को कहां जाहिर करता”.

चंपई सोरेन ने लिखा है कि 3 जुलाई को विधायक दल की बैठक बुलाई गई थी. जबकि विधायक दल की बैठक बुलाने का अधिकार मुख्यमंत्री के पास होता है. उसी दिन उनसे इस्तीफा भी मांग लिया गया. अब सवाल है कि इस्तीफा लेने की इतनी हड़बड़ी क्यों थी और यह फैसला किसने लिया.

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