Breaking
Tue. Apr 7th, 2026

हरिणा पर्व उर्फ रज पर्व को लेकर प्रचलित पौराणिक कथा–उज्जल कुमार मंडल

पूरे देश के ज्यादातर हिस्सों में जहां आज भी महिलाओं के महावारी से जुड़े मिथ्यकों, अंधविश्वासों व झिझक से छुटकारा नहीं हो पाया है वहीं झारखंड राज्य के पुर्वी सिंहभूम जिला पोटका प्रखंड अंतर्गत हरिणा को केन्द्रित कर पूरे प्रमंडल में इसे उत्सव कि तरह परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। यह जेष्ठ महिने की त्रयोदशी से आशाड़ महिने के प्रतिपाद चार दिन तक चलने वाला लम्बा महावारी उत्सव है।

बूढ़े बुजुर्गों के अनुसार रजो शब्द राजस्वला होने से लिया गया है। इस उत्सव के पहले दिन को पहली रजो कहा जाता है दूसरे दिन को मिथुन संक्रांति एवं तीसरे दिन को वासी रजो तथा आखिरी दिन को बासुमति स्नान कहा जाता है।

ऐसा माना जाता है कि इस उत्सव के पहले तीन दिनों के दौरान धरतीमाता यानी भू देवी अपने मासिक चक्र से गुजरती है अतः संक्रांति के दिन धरती को नहीं खोदने की परंपरा है, चौथा दिन यानी आषाढ़ का पहला दिन जिससे बारिश की शुरुआत भी मानी जाती है उसके स्नान करने का समय होता है। यह भी कहा जाता है कि जिस तरह किशोरियों के मासिक चक्र शुरू होने से वह परिपक्व हो जाती है इस तरह किसान फसल उगाने के लिए रजो पर्व के बाद धरती मां भी परिपक्व हो जाती है।

यह मानसून आने का भी समय होता है रजो पर्व के दौरान क्षैत्र भर की महिलाएं नए कपड़े पहनती हैं मेहंदी, कुमकुम ,अलता आदि लगती है साथ ही साथ कहीं-कहीं झूला झूलने एवं पारंपरिक गीत गाने की भी परंपरा है।

शहरों में यह परंपरा धीरे-धीरे लोप हो रही है सोशल मीडिया एवं राज्य सरकार के प्रयास की वजह से अब यह त्यौहार फिर से चर्चा बटोर कर हमारे संस्कृति का हिस्सा बनकर समाज को उनके प्रति सजग बनाने का काम कर रही है।

Related Post