जमशेदपुर। सोनारी निवासी और फ्री लीगल एड कमेटी के अध्यक्ष प्रेमचंद का शुक्रवार सुबह टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच) में निधन हो गया। वे पिछले दो महीनों से अस्पताल में भर्ती थे। शुरुआत में उन्हें निमोनिया की शिकायत पर अस्पताल में दाखिल कराया गया था, लेकिन जांच के दौरान यह भी सामने आया कि उनका हृदय ठीक तरह से काम नहीं कर रहा है। टीएमएच के कैथलैब में उनका इलाज चल रहा था। शुक्रवार सुबह लगभग 10 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
प्रेमचंद ने अपना पूरा जीवन झारखंड में डायन प्रथा जैसे अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष को समर्पित कर दिया। समाज सुधार की इस राह में उन्होंने निजी जीवन का त्याग किया और विवाह नहीं किया। डायन प्रथा उन्मूलन के लिए कानून बनवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस अभियान में फ्री लीगल एड कमेटी के महासचिव एडवोकेट जी.एस. जायसवाल ने भी उनका साथ दिया।
वे केवल अंधविश्वास के खिलाफ ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए भी लगातार सक्रिय रहे। विचाराधीन कैदियों के साथ हो रहे मानवाधिकार हनन के मामलों को उन्होंने फ्री लीगल एड कमेटी के सदस्य जवाहरलाल शर्मा के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया। उनके प्रयासों से कई निर्दोष कैदियों को न्याय मिला और बड़ी संख्या में लोगों की जेल से रिहाई संभव हो सकी।
प्रेमचंद की सबसे बड़ी उपलब्धि पद्मश्री सम्मानित छुटनी महतो को माना जाता है। डायन प्रताड़ना की शिकार छुटनी महतो को उन्होंने अपनी संस्था से जोड़ा और उन्हें जमीनी स्तर पर इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया। छुटनी महतो ने बाद में डायन प्रथा उन्मूलन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया, जिसके लिए उन्हें भारत सरकार की ओर से पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। प्रेमचंद अक्सर कहा करते थे कि छुटनी महतो ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि हैं।
मूल रूप से बनारस के रहने वाले प्रेमचंद जेपी आंदोलन के दौरान सक्रिय भूमिका निभाने के लिए जमशेदपुर आए थे और फिर यहीं के होकर रह गए। उन्होंने आजीवन समाज सेवा को ही अपना परिवार माना। उनके पारिवारिक सदस्यों के बारे में बनारस में कौन और कहां हैं, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। उनके निधन से सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के क्षेत्र में एक सशक्त आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई।

