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डोम्बारी बुरू शहादत दिवस: 126 वर्ष बाद भी ताजा है आदिवासी नरसंहार की पीड़ा

खूंटी: झारखंड के खूंटी जिले स्थित डोम्बारी बुरू में आज 126वां शहादत दिवस श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया गया। इसी स्थान पर 9 जनवरी 1900 को ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एकत्र हुए सैकड़ों निहत्थे आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की थी। इस नरसंहार में पहाड़ी और पास बहने वाली ताजना नदी की सहायक धारा तक खून से लाल हो गई थी।

डोम्बारी बुरू का यह नरसंहार धरती आबा बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चल रहे उलगुलान (महान विद्रोह) के दौरान हुआ था। उस समय आदिवासी समुदाय “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” के नारे के साथ अंग्रेजों और जमींदारों के शोषण के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। हजारों की संख्या में आदिवासी तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ डोम्बारी बुरू पहाड़ी पर एकत्र हुए थे।

ब्रिटिश गुप्तचरों से सूचना मिलने के बाद अंग्रेजी सेना ने पहाड़ी को चारों ओर से घेर लिया और बिना किसी चेतावनी के गोलीबारी और तोपों से हमला कर दिया। इस हमले में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी मारे गए। ब्रिटिश अभिलेखों में जहां केवल 11–12 मौतों का उल्लेख है, वहीं समकालीन अखबारों, लोकगीतों और लोककथाओं में हजारों शहीदों की बात कही गई है। वर्ष 1957 की बिहार सरकार की रिपोर्ट में भी लगभग 200 मौतों का अनुमान लगाया गया है।

स्थानीय स्मारक पर कुछ प्रमुख शहीदों के नाम अंकित हैं, जिनमें

हाथीराम मुंडा और सिंगराई मुंडा शामिल हैं, जिन्हें घायल अवस्था में अंग्रेजों ने जिंदा दफना दिया था। इसके अलावा हाड़ी मुंडा, मझिया मुंडा, बंकन मुंडा की पत्नी, मझिया मुंडा की पत्नी और डुंगन्ग मुंडा की पत्नी के नाम भी दर्ज हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में शहीद आज भी गुमनाम हैं।

इस हमले में बिरसा मुंडा बच निकले थे, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ्तार कर रांची जेल में रखा गया, जहां उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। आज भी आदिवासी समाज उन्हें “धरती आबा” के रूप में याद करता है।

वर्तमान में डोम्बारी बुरू पर 110 फीट ऊंचा शहीद स्तंभ और उसके नीचे धरती आबा बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्थापित है। हर वर्ष 9 जनवरी को यहां शहीद दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

डोम्बारी बुरू का यह इतिहास आज भी आदिवासी समाज के संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है। यह घटना बताती है कि देश की आज़ादी की कीमत कितनी भारी थी, जिसे आदिवासियों ने अपने खून से चुकाया।

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