जमशेदपुर। जीवन में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपने कर्तव्य को नौकरी, पद या निर्धारित समय-सीमा तक सीमित नहीं रखते। उनके लिए सेवानिवृत्ति जीवन का अंत नहीं, बल्कि समाज के लिए कुछ नया करने की शुरुआत होती है। भारतीय सेना में करीब 35 वर्षों तक सेवाएं देने वाले ब्रिगेडियर पोगुला गणेशम् इसका प्रेरक उदाहरण हैं। सैन्य जीवन से विदाई लेने के बाद उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाओं को खोजने, स्थानीय समस्याओं के व्यावहारिक समाधान सामने लाने और नवाचारों को रोजगार का माध्यम बनाने का संकल्प लिया।
पोगुला गणेशम् का जन्म 10 नवंबर 1949 को तत्कालीन मद्रास प्रांत के भूमपल्ली गांव में हुआ था, जो वर्तमान में तेलंगाना में स्थित है। उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और दिल्ली विश्वविद्यालय से एमबीए की डिग्री हासिल की। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौर में देशसेवा की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय सेना में प्रवेश किया। लगभग साढ़े तीन दशक के सैन्य जीवन में उन्होंने तकनीकी विशेषज्ञता, नेतृत्व क्षमता और अनुशासन का परिचय दिया। वे बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों के विशेषज्ञ बने और कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी शामिल रहे।
कारगिल युद्ध के बाद उन्होंने भारतीय सेना के लिए ‘विंडी’ नामक वाहन विकसित किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय पेटेंट मिला। वर्ष 2004 की गणतंत्र दिवस परेड में इस वाहन का प्रदर्शन किया गया। उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए वर्ष 2005 में उन्हें विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। 31 अक्टूबर 2005 को सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने अपने अनुभव और तकनीकी ज्ञान को समाजहित में इस्तेमाल करने का फैसला किया।
इसी उद्देश्य से 20 नवंबर 2005 को उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ ‘पल्ले सृजना’ संस्था की स्थापना की। संस्था का मुख्य उद्देश्य गांवों, बस्तियों और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों में मौजूद ऐसी प्रतिभाओं को पहचानना है, जिनके पास संसाधनों की कमी के बावजूद स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए उपयोगी विचार और तकनीक मौजूद हैं। कुछ समय तक हैदराबाद की डायनेमिक्स लिमिटेड में निदेशक के रूप में काम करने के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान ग्रामीण नवाचारों को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित कर दिया। इस कठिन सफर में उनकी पत्नी अरुणा ने भी उनका साथ दिया और अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ब्रिगेडियर गणेशम् का मानना है कि आविष्कार करने के लिए महंगी प्रयोगशालाओं, अत्याधुनिक उपकरणों या उच्च शिक्षा की डिग्री का होना अनिवार्य नहीं है। ग्रामीण जीवन की चुनौतियों से जूझते हुए सामान्य लोग भी अपने अनुभव और सूझबूझ से ऐसे समाधान विकसित कर सकते हैं, जो बड़े स्तर पर समाज के काम आ सकते हैं। इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए ‘पल्ले सृजना’ ने तेलुगु भाषा में द्वैमासिक पत्रिका शुरू की। इसमें ग्रामीण महिलाओं, बुजुर्गों और सीमित औपचारिक शिक्षा प्राप्त लोगों के नवाचारों को जगह दी जाती है। पत्रिका के संचालन की जिम्मेदारी उनकी पत्नी अरुणा संभालती हैं।
संस्था के शुरुआती चर्चित प्रयासों में चिंताकिंडी मल्लेशम् द्वारा विकसित साड़ी बुनाई की मशीन उल्लेखनीय है। मल्लेशम् ने अपनी मां को साड़ी बुनते समय होने वाली शारीरिक परेशानी से राहत दिलाने के उद्देश्य से यह मशीन तैयार की थी। इस नवाचार को व्यापक पहचान मिली और वर्ष 2007 में उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया। इस उपलब्धि ने ग्रामीण प्रतिभाओं की खोज और उन्हें प्रोत्साहित करने के अभियान को नई दिशा दी।
ब्रिगेडियर गणेशम् और उनकी संस्था अब तक लगभग 300 नवाचारों को सामने ला चुकी है, जबकि करीब 2,000 प्रयोगों का अभिलेखीकरण किया गया है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लगभग 1,200 गांवों में चार हजार किलोमीटर की पदयात्रा के माध्यम से ग्रामीण प्रतिभाओं की खोज की गई। इस दौरान वे करीब एक लाख विद्यार्थियों को संबोधित कर चुके हैं। हर तीन महीने में आयोजित होने वाली ‘चिन्ना शोधयात्रा’ के जरिए बच्चों और युवाओं में जिज्ञासा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समस्याओं का समाधान खोजने की प्रवृत्ति विकसित करने का प्रयास किया जाता है। इस अभियान से लगभग तीन हजार स्वयंसेवक जुड़े हैं।
संस्था के प्रयासों से कई नवाचारकों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इनमें 13 नवाचारकों को राष्ट्रपति पुरस्कार और दो को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। ब्रिगेडियर गणेशम् केवल प्रतिभाओं की खोज तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके उत्पादों को प्रदर्शनियों, प्रतियोगिताओं और व्यावसायिक मंचों तक पहुंचाने में भी मदद करते हैं। इसका उद्देश्य उपयोगी विचारों को वास्तविक उत्पादों में बदलना और नवाचारकों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
कोरोना महामारी के दौरान भी उन्होंने वेबिनार के माध्यम से इस अभियान को जारी रखा। संस्था से जुड़े नवाचारों को बाजार तक पहुंचाने से रोजगार के नए अवसर पैदा हुए और अनेक परिवारों को आजीविका का आधार मिला। इन नवाचारों से जुड़े कारोबार के दस करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंचने का उल्लेख इस बात को रेखांकित करता है कि स्थानीय प्रतिभाओं को उचित मार्गदर्शन और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
इसके अतिरिक्त, ब्रिगेडियर गणेशम् तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के राज्य सैनिक सलाहकार बोर्ड से जुड़कर पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए भी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने सैन्य जीवन में देश की रक्षा के लिए अपनी तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल किया और सेवानिवृत्ति के बाद उसी वैज्ञानिक सोच को समाज के वंचित और ग्रामीण वर्गों की उन्नति का माध्यम बनाया।
ब्रिगेडियर पोगुला गणेशम् अपने सैन्य जीवन को पहला और समाजसेवा के वर्तमान अध्याय को दूसरा जीवन मानते हैं। उनके जीवन की यह यात्रा बताती है कि प्रतिभा किसी शहर, पद या डिग्री की मोहताज नहीं होती। जरूरत केवल उसे पहचानने, प्रोत्साहित करने और आगे बढ़ने का अवसर देने की है। उनका योगदान इस विश्वास को मजबूत करता है कि अनुभव के साथ सेवा का संकल्प जुड़ जाए, तो सेवानिवृत्ति भी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले एक नए अभियान की शुरुआत बन सकती है। यही वजह है कि ब्रिगेडियर गणेशम् एक सैन्य अधिकारी के साथ-साथ ग्रामीण नवाचारों को नई पहचान दिलाने वाले कर्मयोगी के रूप में भी प्रेरणा देते हैं।

