जमशेदपुर।भारतीय साहित्य के क्षितिज पर कुछ ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने पौराणिक आख्यानों को मात्र धार्मिक संदर्भों से निकालकर मानव मन की गहन संवेदनाओं, द्वंद्वों और अस्तित्वगत प्रश्नों से जोड़ दिया। ऐसे ही मूर्धन्य साहित्यकारों में शीर्ष स्थान पर आते हैं मराठी के कालजयी उपन्यासकार शिवाजी सावंत। सावंत जी की जयंती के पावन अवसर पर संपूर्ण साहित्यिक जगत उनके इस अनुपम योगदान का स्मरण कर उन्हें कृतज्ञतापूर्वक नमन करता है।
शिवाजी सावंत जी का नाम लेते ही पाठक के मन में सबसे पहले उनके अमर उपन्यास ‘मृत्युंजय’ की छवि उभरती है। महाभारत में कर्ण का चरित्र सदैव उपेक्षित और जटिल माना गया, परंतु सावंत जी ने अपनी अद्भुत लेखनी के माध्यम से कर्ण के भीतर के संत्रास, उसके आत्मसम्मान, त्याग और दानवीरता को एक नया फलक प्रदान किया। ‘मृत्युंजय’ केवल एक पौराणिक गाथा नहीं है, बल्कि यह अन्याय के विरुद्ध खड़े उस व्यक्ति की अंतर्कथा है जो जीवनपर्यंत अपनी पहचान और प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करता रहा। इस कृति ने न केवल मराठी साहित्य में इतिहास रचा, बल्कि हिंदी सहित विभिन्न भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनूदित होकर वैश्विक स्तर पर पाठकों के दिलों को छुआ।’
युगांधर’ और अन्य अमर कृतियाँ
कर्ण के बाद सावंत जी ने भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और दर्शन पर आधारित महाउपन्यास ‘युगांधर’ की रचना की। जहाँ समाज प्रायः कृष्ण को चमत्कारी भगवान के रूप में देखता है, वहीं सावंत जी ने उन्हें एक युगद्रष्टा, नीतिज्ञ, कर्मयोगी और संवेदनशील मानव के रूप में प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त, उनकी अन्य
छावा: छत्रपति शिवाजी महाराज के पराक्रमी पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज के अदम्य साहस और बलिदान पर केंद्रित एक ऐतिहासिक दस्तावेज।समाज सुधारक डॉ. आप्पासाहेब पवार के जीवन पर आधारित प्रेरणादायी उपन्यास।
युगपुरुष: स्वामी विवेकानंद के वैचारिक दर्शन और जीवन यात्रा को समर्पित एक उत्कृष्ट रचना।संवेदना और भाषा का अनूठा संगम
सावंत जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका सघन शोध और आलंकारिक, प्रवाहमयी भाषा शैली थी। उनके शब्दों में ऐसा जादुई प्रवाह था कि पाठक पढ़ते समय उसी कालखंड में पहुँच जाता था। उनके पात्र कागज़ पर लिखे शब्द न होकर जीवित, स्पंदनशील मनुष्यों की तरह अपने सुख-दुःख साझा करते प्रतीत होते हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ (भारतीय ज्ञानपीठ) सहित देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया।
शिवाजी सावंत जी ने हमें सिखाया कि इतिहास और मिथक केवल अतीत की कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि वे वर्तमान जीवन के नैतिक और दार्शनिक मार्गदर्शक हैं। उनकी जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनकी कालजयी कृतियों को पढ़ें और उनके द्वारा उकेरे गए मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में आत्मसात करें।
वरुण कुमार
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

