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आखिर कौन था वो सांसद, जिसके एक वोट से गिर गई थी वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार?

By Rajdhani News Dec 25, 2020 #ataljee #bjp

लोग चाहते हैं हमारी सरकार चले. लोग चाहते हैं हमें सेवा करने का आगे मौका मिले और मुझे विश्वास है कि ये सदन इसी पक्ष में फैसला करेगा. 13 महीने पुरानी एनडीए सरकार के खिलाफ लोकसभा में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही थी. तब 17 अप्रैल 1999 को लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने भाषण के दौरान ये बात कही थी. मगर सदन ने फैसला उनकी सरकार के खिलाफ दिया और महज एक वोट से वाजपेयी की सरकार गिर गई. आज देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन है. तो इस मौके पर किस्सा इस देश के उस सियासी घटनाक्रम का जिसका केंद्र थे ‘अटल’.

क्यों पैदा हुई अविश्वास प्रस्ताव की स्थिति- साल 1996 में पीवी नरसिम्महा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार जाने के बाद देश की सियासत में उथल-पुथल मचा.

1996 से लेकर 1998 की शुरुआत तक देश तीन प्रधानमंत्रियों को देख चुका था. इसमें 13 दिन के लिए पीएम बने अटल बिहारी भी शामिल थे. 1998 के आरंभ के साथ ही देश मध्यावधि चुनाव के मुहाने पर आ खड़ा हुआ. 16 फरवरी से 28 फरवरी के बीच तीन चरणों में चुनाव संपन्न हुए और किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला.

इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 182 सीटें मिली और वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. बीजेपी ने शिवसेना, अकाली दल, समता पार्टी, एआईएडीएमके और बिजू जनता दल के सहयोग से सरकार बनाई और अटल बिहार वाजपेयी फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे. तमिलनाडु की पार्टी एआईएडीएमके एनडीए का हिस्सा थी, जो तब राज्य की सत्ता से बाहर थी और पार्टी प्रमुख थीं जे जयलललिता.

सुब्रमण्यम स्वामी की चाय मीटिंग

जयलललिता ने वाजपेयी के पीएम बनते ही उनपर तमिलनाडु में डीएमके यानी एम करुणानिधी की सरकार को बर्खास्त करने के दबाव बनाने शुरू कर दिए. चूंकि वाजपेयी ने देश की सियासत के लंबे दौर को देखा था. इसलिए वो जानते थे कि किसी भी चुनी हुई सरकार को अपने हित के लिए बर्खास्त करने का सियासी संदेश ठीक नहीं होगा. वाजपेयी ने जयललिता को मना कर दिया. इसके बाद फ्रेम आए वाजपेयी से नाराज सुब्रमण्यम स्वामी. स्वामी ने दिल्ली के अशोका होटल में जयललिता और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच एक चाय मीटिंग करवाई, जो काफी मशहूर हुई. इसके बाद अम्मा ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया. एनडीए की सरकार अल्पमत में आ गई और फिर शुरू हुई सियासी रस्साकस्सी.

पहले मयावती ने पलटा खेल

17 अप्रैल को संसद में बहुमत साबित करने के लिए बीजेपी के नेता नंबर जुटाने की कोशिश में जुटे थे. तभी एक दिन पहले यानी 16 अप्रैल को संसद भवन से निकलते वक्त वाजपेयी से बसपा सुप्रिमो मयावती ने कहा- घबराइये मत सब ठीक होगा. मयावती तब पांच सांसदों की नेता थी, जिन्हें अपने पाले में लाने में प्रमोद महाजन और लालकृष्ण आडवाणी सफल हो चुके थे. मयावती ने कहा कि बसपा के पांचों सांसद वोटिंग के दौरान संसद में मौजूद नहीं रहेंगे. नेशनल कांफ्रेंस भी वाजपेयी सरकार के समर्थन में खड़ी थी. मगर 144 खंभों वाला संसद भवन अगले दिन एक बेहद ही नाटकिय घटना का इंतजार कर रहा था.

लोकसभा में चमके नतीजे और गिरी सरकार

बहुमत साबित करने वाले दिन यानी 17 अप्रैल की सुबह कांग्रेस नेता शरद पवार ने मयावती से मिलकर बीजेपी की रणनीति को चित कर दिया. संसद में पूरे दिन बहस चलती रही और आखिर में शाम तक बात वोटिंग पर पहुंची. तब तक सभी को ये लग रहा था कि वाजपेयी की सरकार इस बाधा को पार कर लेगी. मगर वोटिंग के बाद जब स्क्रीन पर चमके नतीजे ने पूरे देश को हैरान कर दिया. स्पीकर जी एम सी बालयोगी ने कांपती हुई आवाज में बोला- आएय 269, नोज 270. महज एक वोट से अटल बिहारी वाजपेई की 13 महीने पुरानी सरकार गिर गई थी.

आखिर कौन था वो सांसद?

इससे बाद बहस छिड़ी कि आखिर वो एक वोट किसका था? कौन था वो सांसद जिसके संसद में दबाए लाल बटन ने वाजपेयी सरकार उम्र तय कर दी? तब ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गमांग का नाम सामने आया. जो ठीक दो महीनों पहले यानी 18 फरवरी को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे, मगर उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा नहीं दिया था. वो कोरापुट संसदीय क्षेत्र की नुमांइदगी कर रहे थे. सांसद के रूप में गमांग वोट देने पहुंचे और कांग्रेस के सदस्य होने के नाते सरकार के खिलाफ वोट दिया. हालांकि, कुछ राजनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना था कि ये एक वोट नेशनल कांफ्रेस के सांसद सैफुद्दीन सोज का था. सोज ने पार्टी के व्हिप के खिलाफ जाकर एनडीए के विरुद्ध वोट दिया था. अगले दिन सोज को फारुख अब्दुल्ला ने पार्टी से निकाल दिया.

साल 2015 में गिरधर गमांग ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया. तब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजे इस्तीफे की चिट्ठी में लिखा- 1999 में मुझे अटल सरकार को गिराने का जिम्मेदार मानते हैं लोग और पार्टी इसपर मेरे साथ कभी खड़ी नहीं दिखी.

सत्ता में हुई वाजपेयी की वापसी

खैर, एनडीए की सरकार गिरी, कोई और पार्टी सरकार नहीं बना सकी अटल बिहारी कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे. चुनाव होने से पहले पाकिस्तानी सेना ने कारगिल में घुसपैठ कर दी. जिसके बाद भारतीय सेना ने उनके खिलाफ ऑपरेशन विजय चलाया और फतह हासिल की. अगले वर्ष चुनाव हुए और युद्ध में जीता हुआ नेता शायद कभी चुनाव नहीं हारता. एनडीए की सत्ता में वापसी हुई अटल बिहारी वाजपेयी फिर से प्रधानमंत्री बने और इस बार पूरे पांच साल सरकार चलाई. मगर ये बहस का विषय अब भी है कि अटल बिहारी वाजयेपी की सरकार गिराने में सबसे अहम भूमिका किसकी थी. गमांग या मायावती या फिर सैफुद्दीन सोज.

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